
24 अप्रैल, 2026 की शाम को भारतीय राजनीति के इतिहास में एक ‘ब्लैक फ्राइडे’ के रूप में याद किया जाएगा, कम से कम आम आदमी पार्टी (AAP) के लिए। महीनों से चल रही अंतर्कलह, राज्यसभा में पदों को लेकर खींचतान और नेतृत्व के प्रति बढ़ते अविश्वास ने आज उस समय एक ज्वालामुखी का रूप ले लिया जब पार्टी के सबसे चमकते सितारे, राघव चड्ढा, ने न केवल पार्टी छोड़ी, बल्कि राज्यसभा में पार्टी की ईंट से ईंट बजा दी।
चड्ढा ने न केवल अपना इस्तीफा सौंपा है, बल्कि भाजपा में शामिल होने का औपचारिक ऐलान करते हुए दावा किया है कि राज्यसभा में ‘आप’ के दो-तिहाई (2/3) सांसद उनके साथ हैं। यह बगावत अरविंद केजरीवाल के राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा व्यक्तिगत और संगठनात्मक झटका है।
राघव चड्ढा और अरविंद केजरीवाल के बीच दरार रातों-रात पैदा नहीं हुई। इसकी पटकथा पिछले कई महीनों से लिखी जा रही थी।विद्रोह की तत्काल चिंगारी तब भड़की जब पिछले सप्ताह ‘आप’ नेतृत्व ने राघव चड्ढा को राज्यसभा में पार्टी के ‘उप-नेता’ (Deputy Leader) के पद से हटा दिया। चड्ढा समर्थकों का कहना है कि यह निर्णय बिना किसी चर्चा के लिया गया, जिसका उद्देश्य चड्ढा के बढ़ते कद को छोटा करना था।
चड्ढा ने अपने इस्तीफे में संकेत दिया कि पार्टी अब “भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन” से हटकर केवल “सत्ता और व्यक्ति पूजा” का केंद्र बन गई है। उन्होंने पार्टी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र की कमी और ‘चाटुकारिता’ को बढ़ावा देने के गंभीर आरोप लगाए।पिछले साल चड्ढा के लंबे लंदन प्रवास और उसके बाद पार्टी की प्रमुख बैठकों से उनकी अनुपस्थिति ने पहले ही संकेत दे दिए थे कि ‘ऑल इज नॉट वेल’।
राघव चड्ढा का दावा है कि उनके साथ राज्यसभा के कुल 10 सांसदों में से लगभग 7 सांसद (दो-तिहाई) भाजपा के साथ जुड़ने को तैयार हैं। यह आंकड़ा कानून की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। संविधान के अनुसार, यदि किसी पार्टी के दो-तिहाई सांसद एक साथ टूटकर दूसरी पार्टी में शामिल होते हैं या अलग गुट बनाते हैं, तो उनकी सदस्यता रद्द नहीं होती। चड्ढा का यह मास्टरस्ट्रोक केजरीवाल को कानूनी रूप से भी असहाय बना देता है।
जो अपनी पार्टी के खिलाफ पहले ही मुखर थीं, उनका चड्ढा के साथ जाना तय माना जा रहा था। यह नाम सबसे चौंकाने वाला और ‘आप’ के लिए सबसे घातक है। संदीप पाठक पार्टी के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री और ‘रणनीतिकार’ माने जाते हैं। उनका जाना ‘आप’ के संगठनात्मक ढांचे के ढहने जैसा है। पंजाब से आने वाले इस वैश्विक चेहरे ने भाजपा के साथ ‘राष्ट्र प्रथम’ के विजन पर सहमति जताई है।ये पंजाब के बड़े उद्योगपति और प्रभावशाली चेहरे हैं, जिनके जाने से पंजाब की भगवंत मान सरकार पर भी दबाव बढ़ेगा।
भाजपा के लिए राघव चड्ढा को अपने पाले में लाना एक बड़ी रणनीतिक जीत है। भाजपा को दिल्ली में एक ऐसे चेहरे की जरूरत थी जो पढ़ा-लिखा हो, युवाओं में लोकप्रिय हो और जिसकी छवि बेदाग हो। राघव चड्ढा (CA और अनुभवी सांसद) इस सांचे में फिट बैठते हैं। इन सांसदों के आने से राज्यसभा में भाजपा को पूर्ण बहुमत के और करीब पहुँचने में मदद मिलेगी, जिससे महत्वपूर्ण विधेयकों (जैसे समान नागरिक संहिता) को पारित कराना आसान हो जाएगा। भाजपा अब राघव चड्ढा को दिल्ली के आगामी विधानसभा चुनावों में ‘आप’ के खिलाफ एक मुख्य अस्त्र के रूप में इस्तेमाल करेगी।
यह टूट ‘आप’ के अस्तित्व पर तीन स्तरों पर प्रहार करती है यदि केजरीवाल अपने सबसे भरोसेमंद और ‘पोस्टर बॉय’ राघव चड्ढा को नहीं रोक पाए, तो कार्यकर्ताओं में यह संदेश जाएगा कि नेतृत्व अब नियंत्रण खो चुका है। चूंकि बागी सांसदों में अधिकांश पंजाब से हैं, इसलिए पंजाब की भगवंत मान सरकार के भीतर भी असंतोष की लहर दौड़ सकती है। विपक्षी दल अब पंजाब में भी ‘अविश्वास प्रस्ताव’ की बात कर सकते हैं। ‘आप’ जो राष्ट्रीय पार्टी बनकर उभरी थी, इस टूट के बाद वह फिर से एक क्षेत्रीय दल की स्थिति में सिमट सकती है।
| विवरण | बगावत से पहले | बगावत के बाद (संभावित) |
| कुल राज्यसभा सांसद | 10 | 03 |
| भाजपा का नया गुट | 00 | 07 |
| संसदीय स्थिति | मुख्य विपक्षी स्वर | नगण्य उपस्थिति |
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राघव चड्ढा का जाना ‘आप’ के लिए वैसा ही है जैसा ज्योतिरादित्य सिंधिया का कांग्रेस छोड़ना था। यह दर्शाता है कि पार्टी के भीतर ‘युवा नेतृत्व’ और ‘पुराने गार्ड्स’ के बीच की खाई अब पाटी नहीं जा सकती। “राघव चड्ढा केवल एक सांसद नहीं थे, वे ‘आप’ का अंग्रेजी बोलने वाला, सभ्य और तार्किक चेहरा थे। उनके जाने से पार्टी का ‘इंटेलेक्चुअल बेस’ खत्म हो गया है।” संभावना है कि भाजपा चड्ढा को केंद्र में मंत्री पद या दिल्ली में बड़ी सांगठनिक जिम्मेदारी दे सकती है।
24 अप्रैल 2026 की यह घटना दिल्ली की राजनीति में एक निर्णायक मोड़ है। राघव चड्ढा का भाजपा में जाना अरविंद केजरीवाल के उस ‘अभेद्य किले’ में सेंध है जिसे उन्होंने पिछले एक दशक में कड़ी मेहनत से बनाया था।
संदीप पाठक, स्वाति मालीवाल और हरभजन सिंह जैसे नामों का चड्ढा के साथ जुड़ना यह बताता है कि यह केवल एक व्यक्ति की महात्वाकांक्षा नहीं, बल्कि सामूहिक असंतोष का परिणाम है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अरविंद केजरीवाल इस मलबे से अपनी पार्टी को फिर से खड़ा कर पाएंगे, या राघव चड्ढा का यह प्रहार ‘आप’ की राजनीति के ताबूत में आखिरी कील साबित होगा?



