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लंबित मामलों की बढ़ती संख्या: लोकतंत्र के लिए खतरा

न्यायाधीशों की कमी और अव्यवस्था

भारत की न्यायपालिका पर लंबित मामलों का भारी बोझ आज भी देश की सबसे बड़ी प्रशासनिक चुनौतियों में से एक है। राष्ट्रीय न्यायिक डाटा ग्रिड के ताजा आंकड़ों के अनुसार 2025 की स्थिति में देशभर के अदालतों में लगभग 5.29 करोड़ मामले लंबित हैं, जिनमें 4.65 करोड़ जिला और अधीनस्थ न्यायालयों में, 63 लाख से अधिक उच्च न्यायालयों में, और लगभग 87 हजार सुप्रीम कोर्ट में फंसे हैं।​

भारत के हर नागरिक की जिंदगी से जुड़ा यह मामला बेहद गहरी चिन्ता का विषय है। न्याय व्यवस्था का कार्य न्याय देना है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में यह प्रणाली न्याय को देरी से उपलब्ध करा रही है, जिससे “न्याय में देरी, न्याय से वंचित” कहावत चरितार्थ हो रही है। लंबित मामलों के बढ़ने की कई वजहों में न्यायाधीशों की कमी, अवसंरचना की कमी, सरकारी विभागों द्वारा अनावश्यक मुकदमे दायर करना, और समझौता प्रक्रिया की कमी प्रमुख है।​

न्यायालयों की देरी आम नागरिकों का जीवन प्रभावित करती है। जमीन के विवादों का वर्षों तक लंबित रहना परिवारों को विभाजित करता है। गरीब वर्ग के लिए न्याय पाने की प्रक्रिया वित्तीय और मानसिक बोझ बन जाती है। इसके कारण कई बार लोग न्याय न मिलने से निराश होकर अपने हक को खो देते हैं। साथ ही व्यापार में अनिश्चितता बढ़ती है, जिससे आर्थिक विकास पर नकारात्मक असर पड़ता है।​

भारत के आम आदमी के लिए “तारीख पर तारीख” सुनना आम बात है। वकील अक्सर अगली तारीख के नाम पर पीड़ित से फीस वसूलता है, और मुकदमा अनिश्चित काल के लिए खिंचता रहता है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोग अपने किसी मामले को लड़ते रहते हैं, जिसमें कई बार तीन-चार पीढ़ियाँ गुजर जाती हैं।

इतनी भारी संख्या में लंबित मामलों के कारण देश की उत्पादकता और आर्थिक विकास पर भारी असर पड़ता है। व्यापार, निवेश, संपत्ति हस्तांतरण और रोज़मर्रा के फैसले सभी अटक जाते हैं। छोटे व्यापारी, उद्योगपति और किसान कोर्ट के फैसलों के अभाव में निवेश और नई शुरुआत में हिचकते हैं।

भारत में प्रति दस लाख की आबादी पर लगभग 21 न्यायाधीश हैं, जबकि विधि आयोग ने 50 न्यायाधीश प्रति दस लाख आबादी की सिफारिश की थी। इसके कारण न्यायिक कार्यभार अत्यधिक है। साथ ही न्यायालय कक्ष, कर्मचारी, सूचना एवं संचार तकनीक में कमी के कारण भी कार्यवाही प्रभावित होती है। कई उच्च न्यायालयों में 33% पद रिक्त हैं और जिला स्तर पर भी पूरी क्षमता से काम करना कठिन है।

सरकार को चाहिए कि खाली जजों के पद भरने की प्रक्रिया तेज़ करे। विभागों को अपने विवाद बाहरी समझौते (ADR) या मध्यस्थता से सुलझाने की नीतियाँ बनानी चाहिए। कोविड के बाद वीडियो-हियरिंग, ई-फाइलिंग जैसे प्रयोग बढ़ाए गए, जिनसे गति आई लेकिन पैमाना बढ़ाने की ज़रूरत है। गंभीर अपराध, महिलाओं व बुजुर्गों के मामलों को तेज़ फैसले के लिए विशेष कोर्ट मिलें। कानून की मूल बातें और नागरिक अधिकार आम लोगों को समझाने के लिए अभियान चलाना चाहिए।

कई गरीब, अशिक्षित या हाशिए के नागरिकों के लिए न्याय तक पहुँच एक सपने जैसी बन गई है। वे फीस, दस्तावेज़ी प्रक्रिया और बार-बार कोर्ट जाने के खर्च के कारण न्याय से वंचित रह जाते हैं। महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों के केस में लंबे समय तक न्याय न मिलना आशा और संवेदना दोनों को मार देता है।

​सरकार और न्यायपालिका ने फास्ट ट्रैक कोर्टों की स्थापना, डिजिटल कोर्ट प्रणाली, ई-फाइलिंग, और वैकल्पिक विवाद समाधान जैसे कई कदम उठाए हैं। इसके साथ ही रिक्त न्यायाधीश पदों की पूर्ति और पिछड़े मामलों को जल्दी निपटाने के लिए विशेष समितियां बनाई गई हैं। लेकिन अभी भी सरकार और न्यायपालिका को मिलकर व्यापक स्तर पर संसाधनों, संरचना और प्रशासनिक सुधारों को लागू करना बाकी है ताकि तेजी से न्याय मिल सके।​

भारत की लोकतांत्रिक नागरिकता के लिए एक न्यायसंगत, सुलभ और शीघ्र न्याय प्रणाली अत्यंत आवश्यक है। लंबित मामलों का यह विशाल पहाड़ यदि जल्द नहीं घटाया गया, तो न्याय व्यवस्था का भरोसा टूटेगा। इसके लिए पर्याप्त न्यायाधीशों की भर्ती, आधुनिक तकनीक का उपयोग, प्रशासनिक दक्षता, और सार्वजनिक जागरूकता ज़रूरी है। सरकार, न्यायपालिका, और समाज तीनों को मिलकर न्याय को हर नागरिक तक समय पर पहुँचाने का संकल्प लेना होगा।

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