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इस्पात उद्योग की तेजी Vs पर्यावरण: विकास की कीमत

सप्रयासों की आवश्यकता और भारत का साझा दायित्व

भारत में तेजी से बढ़ रही इस्पात उद्योग की स्थिति एक द्विधा का रूप ले चुकी है। एक ओर यह उद्योग देश की आर्थिक प्रगति, रोजगार सृजन और आत्मनिर्भरता की नींव बना रहा है, वहीं दूसरी ओर इसके कारण हो रही भारी पर्यावरणीय क्षति चिंता का विषय है। इस्पात उद्योग में भारी मात्रा में कोयले के उपयोग के कारण वायु प्रदूषण, जल संसाधनों की क्षति, और हानिकारक उत्सर्जन बढ़ रहे हैं जो भारत के राष्ट्रीय और वैश्विक जलवायु लक्ष्यों के लिए खतरा हैं।

भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा इस्पात उत्पादक देश है। सरकार की योजना है कि वह 2030 तक देश की इस्पात उत्पादन क्षमता लगभग दोगुनी कर दे। यह योजना आर्थिक विकास और बुनियादी ढांचे के विकास को तेजी देने के मकसद से बनाई गई है क्योंकि इस्पात उद्योग सीधे तौर पर रोजगार के कई अवसर प्रदान करता है।

हालांकि, इस वृद्धि की कीमत पर्यावरण पर चुकानी पड़ रही है। भारत की इस्पात उत्पादन प्रक्रिया में लगभग 61% कोयले आधारित ब्लास्ट फर्नेस और ऑक्सीजन फर्नेस तकनीक इस्तेमाल होती है, जो बहुत अधिक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित करती है। वर्तमान में भारत की इस्पात उद्योग से लगभग 12% कुल औद्योगिक प्रदूषण निकलता है जो वैश्विक औसत से 20-25% अधिक है।

इस उच्च कार्बन उत्सर्जन के कारण भारत के जलवायु लक्ष्य, जैसे कि 2070 तक नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन, खतरे में पड़ सकते हैं। साथ ही यूरोपीय संघ जैसी विकसित बाजारों द्वारा लगाए जा रहे कार्बन सीमा शुल्क के कारण भारत के इस्पात निर्यातकों को वित्तीय घाटा उठाना पड़ सकता है।

इस स्थिति में भारतीय इस्पात कंपनियां जैसे टाटा स्टील, JSW स्टील, जिंदल, और SAIL ने स्वच्छ तकनीकों के विकास की दिशा में कुछ पहलें शुरू की हैं, जिसमें नवीकरणीय ऊर्जा का समावेश, मोटर फर्नेस तकनीक के उपयोग और हाइड्रोजन आधारित उत्पादन शामिल हैं। लेकिन इन तकनीकों को व्यापक रूप से अपनाने में अभी भी निवेश और संरचनात्मक बदलाव की जरूरत है।

पर्यावरण की चिंता केवल प्रदूषण तक सीमित नहीं है। स्थानीय समुदायों में प्रदूषण के कारण श्वसन रोग, फसल नुकसान, जल स्रोतों का प्रदूषण और स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं, जिनसे ग्रामीण जीवन प्रभावित हो रहा है। बीते वर्षों में कई जगहों पर स्थानीय लोगों ने प्रदूषण के खिलाफ विरोध प्रदर्शन भी किया है।

इस समस्या का समाधान तभी संभव है जब आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाया जाए। इसके लिए निम्न कदम अत्यंत आवश्यक हैं इस्पात उत्पादन में धीरे-धीरे कोयले आधारित तकनीक से कम-प्रदूषण वाले विकल्पों पर स्थानांतरण। सरकार द्वारा कड़े पर्यावरणीय मानक लागू करना और पेट्रोलियम एवं ऊर्जा संसाधनों की कम-कार्बन उपलब्धता सुनिश्चित करना। स्थानीय समुदायों के स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण के लिए अधिक पारदर्शी निगरानी और सामाजिक जवाबदेही। इस्पात उद्योग में नवीनीकृत ऊर्जा और हाइड्रोजन ईंधन के उपयोग को प्रोत्साहन देना। सर्कुलर इकॉनमी के तहत इस्पात के पुनर्चक्रण और अपशिष्ट प्रबंधन पर जोर देना।

युद्धस्तर की प्राथमिकता से इस दिशा में काम किया जाना भारत के लिए जरूरी है, क्योंकि विकास के साथ स्थिरता ही हमारे अतीत की विरासत और भविष्य की सुरक्षा है।

संक्षेप में, भारत का यह चुनौतीपूर्ण दौर है जिसमें इस्पात उद्योग की बढ़ती ताकत और पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी दोनों को साथ लेकर चलने का रास्ता निकालना होगा। यदि हम सिर्फ तेज़ आर्थिक वृद्धि के लिए पर्यावरण की कीमत चुकाते रहे, तो पछतावा होने का समय दूर नहीं। इसलिए आज से ही डिजिटल और पारदर्शी नीतियों, विज्ञान पर आधारित तकनीकों और जवाबदेह संस्थाओं के माध्यम से भारत को न केवल आर्थिक रूप से, बल्कि पर्यावरण के लिहाज से भी टिकाऊ बनाना होगा।

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