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युद्ध के नए हथियार: संघर्ष क्षेत्र में भोजन और पानी, इंसानियत पर सबसे बड़ा हमला

भूख की मार: रणनीति का हिस्सा

आधुनिक युद्धों का चेहरा बदल चुका है। अगर आपने कभी सोचा हो कि जंग केवल टैंकों, बमों या बंदूकों से लड़ी जाती है, तो आज का सच आपको चौंका सकता है। अब देशों और सशस्त्र गुटों ने साधारण नागरिकों को घुटने टेकने पर मजबूर करने के लिए उनके जीने की बुनियादी जरूरतों यानी भोजन और पानी को भी युद्ध का हथियार बना लिया है। 2025 में यूक्रेन, गाजा, सूडान, म्यांमार सहित दुनिया के कई इलाकों के हालात यही कहते हैं कि आज सबसे बड़ी कीमत इंसानियत चुका रही है।

युद्ध में जब सीमाओं की घेराबंदी की जाती है या सड़कों, रेल और समुद्री मार्गों पर ताले जड़ दिए जाते हैं, तो इनका सबसे गहरा असर आम आदमी पर पड़ता है। गेहूं की बोरी, पानी की टंकी या दूध की थैली ये सभी सत्ता के खेल में शतरंज के मोहरों में बदल गए हैं। कभी जान-बूझकर बाजारों की सप्लाई रोक दी जाती है, तो कभी खेतों को ही आग लगाकर बर्बाद कर दिया जाता है।

उदाहरण के तौर पर, गाजा या यूक्रेन में ब्लॉकेड या बमबारी से लोग हफ्तों-हफ्तों अनाज, दूध, फल और दवाओं के अभाव से जूझने को मजबूर हैं। बच्चे कुपोषण के शिकार हो रहे हैं, गर्भवती महिलाएं अस्पताल में इलाज के लिए तड़प रही हैं, लेकिन पदाधिकारियों के लिए ये केवल एक लड़ाई जीतने के तरीके रह गए न कि जीवन बचाने का सवाल।

भोजन ही नहीं, पानी भी हथियार बन चुका है। जब कोई पक्ष जल स्रोत या बांध पर कब्ज़ा करता है या जल आपूर्ति वाला पाइपलाइन नष्ट कर देता है, तो एक पूरी आबादी तिल-तिल कर मरने लगती है। अफ्रीका के कई हिस्सों में, सीरिया और यमन जैसे देशों में या यूक्रेन के कुछ इलाकों में यह देखा गया कि आम नागरिक दूर-दूर तक पीने का पानी ढूंढते भटकते हैं और चिकित्सा केंद्र पानी के बिना बंद होने की कगार पर पहुंच जाते हैं।

एक इंसान राहतकर्मी का बयान सोचिए “हमारे पास रोटी है लेकिन पानी नहीं, बीमार हैं लेकिन दवाई और सफाई के लिए एक बाल्टी पानी नसीब नहीं!” इस भयावह स्थिति में किसी बीमारी का फैलना या महामारी आना केवल समय की बात रह जाती है।

आधुनिक युद्ध अब खेत-खलिहानों में भी छेड़े जा रहे हैं। कृषि भूमि पर तोप या बम गिराना, नहरों को जहर से दूषित करना, पैदावार बर्बाद कर किसानों को गांव छोड़ने के लिए मजबूर करना इन सबसे भूख का दायरा बढ़ता है। उदाहरण के लिए, अफ्रीका में पहले से सूखे या बाढ़ से जूझते किसान अब हथियारबंद गुटों की वजह से अपने खेत गंवा रहे हैं। यह केवल भूख ही नहीं, ग्रामीण संस्कृति, पहचान और भविष्य के लिए भी खतरे की घंटी है।

किसी भी लड़ाई में सबसे ज़्यादा नुकसान नागरिक ढांचे को होता है जैसे अस्पताल, स्कूल, बिजलीघर, अनाज के गोदाम, पेयजल व्यवस्था या सड़कें। जब इन्हीं संस्थानों को निशाना बनाया जाता है, तब बच्चों की पढ़ाई, लोगों का इलाज, भोजन और पानी सबकुछ एक साथ चौपट हो जाता है। आधुनिक युद्ध में कहीं बिजली काट दी जाती है और अस्पताल की आईसीयू ठप्प हो जाती है, कहीं हफ्तों तक सरकारी वाहन राशन नहीं पहुंचा पाते।

इस डर की वजह से कई बार लोगों को अपने ही देश में शरणार्थी बनना पड़ता है। गांव, कस्बे और शहर वीरान हो जाते हैं, लोकल व्यवसाय तबाह हो जाते हैं, और आपसी भरोसा भी टूट जाता है।

लंबी घेराबंदी या सप्लाई लाइन टूटने के बाद, लोगों के पास अपना घर, खेत, दुकान छोड़कर और जगह भागने के अलावा रास्ता नहीं रहता। आंकड़े बताते हैं कि पूरे अफ्रीका, मिडिल ईस्ट और पूर्वी यूरोप में लाखों-करोड़ों लोग केवल भोजन-पानी के लिए विस्थापित हुए हैं गोली या बम से डरकर हर परिवार की एक अलग कहानी होती है कोई बूढ़ी मां अपने बेटे के लिए दूध की बोतल पाना चाहती है, कोई किसान अपने बच्चों को भूखा नहीं देख सकता और सबकुछ गंवा कर परदेश की ओर चल पड़ता है।

संघर्ष क्षेत्रों में सबसे जरूरी है मानवीय राहत दवाएँ, भोजन, पानी, सांत्वन जब युद्धरत पक्ष ही राहत वाहनों या एजेंसियों को निशाना बनाएं या रोक दें, तब हजारों लोग तिल-तिल कर तड़पते हैं। बहुत बार रेड क्रॉस या डब्ल्यूएफपी जैसी एजेंसियां भी घातक हमलों या प्रतिबंध का शिकार हो जाती हैं। किसी इलाके तक दवा, खाना, पीने का पानी या टेंट न पहुँच पाना पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी का सवाल है।

भूख और प्यास सिर्फ शारीरिक नुकसान नहीं, सामाजिक और मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा असर छोड़ती है। बार-बार राहत के लिए तरसते बच्चों में डर, युवाओं में नाराजगी, महिलाओं में सुरक्षा को लेकर पीड़ा ये सब समाज में गुस्सा, हिंसा और असुरक्षा को जन्म देता है। सामूहिक रूप से यह स्थिति आपसी विश्वास, त्यौहार और सामाजिक मेल-मिलाप तक को दरका देती है।

संयुक्त राष्ट्र से लेकर मानवीय अधिकार संगठनों तक आज यह स्वीकार किया जा रहा है कि भोजन और जल आपूर्ति को रोकना ‘युद्ध अपराध’ है। लेकिन व्यवहार में जब तक राजनैतिक इच्छाशक्ति न हो, जब तक देशों के बीच मानवीय सिद्धांत सर्वोपरि न बनाए जाएं, तब तक लोग भूख-प्यास से मरते रहेंगे और कागज़ों पर निंदा प्रस्ताव पास होते रहेंगे।

जरूरत है कि युद्ध क्षेत्र में मानवीय राहत को सर्वोच्च प्राथमिकता मिले। स्कूल, अस्पताल, पानी व्यवस्था इन पर हमला अलग से दंडनीय बने। सभी देशों, सैनिकों और नेताओं को यह स्वीकार करना होगा कि युद्ध जीतना कभी भी आम नागरिकों को भूखा-प्यासा रखने से संभव नहीं है क्योंकि असली जीत इंसानियत की होती है, सत्ता की नहीं।

2025 में भी अगर हम युद्ध से सिर्फ बम-बारूद नहीं, रोटी और पानी के हथियार बनने की खबरें सुनें, तो यह पूरी सभ्यता की हार है। एक भूखा बच्चा, एक प्यासा किसान, एक बेघर मां हमारी सामाजिक चेतना के लिए सबसे कड़ा सवाल है। युद्ध के मैदान में चाहे कोई जीते, लेकिन अगर आम नागरिक हार रहे हैं, तो वह हर हाल में मानवता की पराजय है।

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