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BRICS विस्तार: क्या भारत दोस्ती और प्रतिस्पर्धा के बीच संतुलन कायम कर पाएगा?

चीन और रूस के साथ भारत की जटिल कूटनीतिक पिच

BRICS का विस्तार विश्व राजनीति और अर्थव्यवस्था की एक नई बहस छेड़ रहा है। भारत सहित कई प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं का यह संगठन अब नए सदस्यों के स्वागत के साथ वैश्विक शक्ति के केंद्र बनने की दिशा में बढ़ रहा है। लेकिन सवाल ये है कि क्या भारत इस विस्तार के बीच दोस्ती और प्रतिद्वंद्विता के संतुलन को सही ढंग से स्थापित कर पाएगा? क्योंकि BRICS की मूल संरचना में ही रूस–चीन के साथ भारत की जटिल रणनीतिक गणित छिपी हुई है।

BRICS, जिसकी स्थापना 2000 के दशक में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका ने की, अब 2025 में इंडोनेशिया को पूर्ण सदस्य के रूप में शामिल करते हुए कई नए सदस्यों तथा पार्टनर देशों के साथ विस्तृत हो गया है। इस विस्तार ने संगठन को केवल पांच से दस से अधिक देशों के समूह में तब्दील कर दिया है, जो विश्व की लगभग आधी आबादी और तीस फीसद वैश्विक तेल उत्पादन के बराबर है। इस समूह ने आर्थिक सहयोग के अलावा जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य, तकनीकी नवाचार जैसे वैश्विक मुद्दों पर भी साझा एजेंडा तैयार किया है।

भारत के लिए यह एक जटिल मोड़ भी है। एक तरफ यह विस्तार BRICS की वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक उपस्थिति को मजबूत करता है और दक्षिण-दक्षिण सहयोग को बढ़ावा देता है, जो परंपरागत पश्चिमी प्रभाव के मुकाबले एक वैकल्पिक बहुपक्षीय व्यवस्था की नींव है। दूसरी तरफ, चीन के साथ सीमा विवाद, आर्थिक प्रतिद्वंद्विता, और क्षेत्रीय अस्थिरता भारत की रणनीतिक सोच में संशय और सावधानी पैदा करते हैं। भारत को न केवल इस नये विस्तार के सदस्यों के साथ तालमेल बैठाना है, बल्कि अपनी धार्मिक, आर्थिक और हेक्सा-पर्यावरणीय विभिन्नताओं के बीच सामंजस्य भी बनाए रखना होगा।

प्रधानमंत्री मोदी ने BRICS के हालिया सम्मेलन में वैश्विक संस्थाओं जैसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, विश्व व्यापार संगठन और अंतरराष्ट्रीय विकास बैंक में आवश्यक सुधार की बात कही। यह संकेत है कि भारत न केवल BRICS के विस्तार का स्वागत करता है, बल्कि चाहता है कि यह समूह एक सशक्त और समावेशी वैश्विक व्यवस्था बनाने में योगदान दे।

BRICS का यह विस्तार मित्रता को अवसर प्रदान करता है लेकिन साथ ही नए सदस्यों के विविध हितों के कारण प्रतिस्पर्धा की स्थिति भी बन सकता है। भारत को यहां बहुत सावधानी से अपनी कूटनीतिक रणनीति और भारत की वैश्विक छवि दोनों को तवज्जो देना होगा ताकि यह विस्तार राष्ट्र के हितों के अनुरूप बने रहे। भारत के लिए यह न केवल प्रतिबद्धता और नेतृत्व की चुनौती है, बल्कि दोस्ती और प्रतिद्वंद्विता के बीच संतुलन का भी परीक्षण है कि वह कैसे वैश्विक दक्षिण के प्रमुख नेतृत्व में अपनी भूमिका अदा करता है।

BRICS की व्यापकता से भारत को कई फायदे होंगे जैसे निवेश, व्यापार और तकनीकी सहयोग के अधिक अवसर। लेकिन इसे चुनौतियों से निपटने के लिए अपने घरेलू और विदेशी नीतिगत समन्वय को और मजबूत करना होगा। इस विस्तार के बाद भारत की भू-राजनीति और क्षेत्रीय सहभागी भूमिकाओं में भी महत्वपूर्ण बदलाव आने की संभावना है।

निष्कर्ष रूप में, BRICS का विस्तार भारत के लिए एक अवसर है, लेकिन साथ ही यह आवश्यकता भी है कि भारत समुचित संतुलन बनाए रखे और विभिन्न वैश्विक हितों के बीच कौशलपूर्वक खेल खेले। दोस्ती और प्रतिद्वंद्विता को साथ लेकर चलना भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती है, जिसे सफलतापूर्वक निपटाने पर ही भारत वैश्विक मंच पर अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज करा पाएगा।

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