
हाल के वर्षों में भारत के लगभग हर शहर और कस्बे से एक जैसी खबरें आ रही हैं कहीं किसी मासूम बच्चे पर कुत्तों के झुंड ने हमला कर दिया, तो कहीं कुत्तों के साथ क्रूरता की दिल दहला देने वाली तस्वीरें सामने आईं। यह केवल गलियों की लड़ाई नहीं रह गई है, बल्कि अब यह सुप्रीम कोर्ट के सामने एक ऐसी नैतिक और कानूनी चुनौती है, जहाँ एक तरफ नागरिकों की सुरक्षा का अधिकार है और दूसरी तरफ बेजुबान जानवरों के प्रति दया का भाव।
कानून की नजर में हर जीवन की कीमत होती है। हमारा संविधान जहां अनुच्छेद 21 के तहत इंसानों को ‘सम्मान के साथ जीने और सुरक्षा’ का अधिकार देता है, वहीं अनुच्छेद 51A(g) के तहत नागरिकों को ‘जीवों के प्रति दया भाव’ रखने की सीख भी देता है।
सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इन दोनों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए? क्या किसी बच्चे की जान बचाने के लिए पूरी आबादी के कुत्तों को हटा देना समाधान है? या क्या केवल जानवरों के अधिकारों की बात करना उन माता-पिता के प्रति अन्याय है जिन्होंने अपने बच्चे को खोया है? यह एक नैतिक धर्मसंकट है जहाँ कोई भी पक्ष पूरी तरह गलत या सही नहीं है।
जब हम ‘सुरक्षा’ की बात करते हैं, तो यह समाज की प्राथमिक मांग होती है। बुजुर्गों का टहलना, बच्चों का पार्क में खेलना और रात में काम से लौटने वालों की सुरक्षा राज्य की जिम्मेदारी है। वहीं, ‘करुणा’ हमारे संस्कार और मानवता का हिस्सा है।
समस्या तब शुरू होती है जब यह बहस ‘हम बनाम वे’ (Humans vs. Animals) बन जाती है। ‘एनिमल लवर्स’ और ‘पीड़ित पक्ष’ के बीच बढ़ती नफरत इस समस्या को और जटिल बना रही है। हमें यह समझना होगा कि करुणा और सुरक्षा एक-दूसरे के दुश्मन नहीं हैं। एक सुरक्षित समाज वह है जहाँ इंसान बेखौफ रहे और जानवर भी क्रूरता का शिकार न हों।
मौजूदा कानून (ABC Rules – Animal Birth Control) कहता है कि कुत्तों को मारकर या उन्हें उनके इलाके से हटाकर समस्या का समाधान नहीं हो सकता। वैज्ञानिक तरीका यह है कि उनकी नसबंदी (Sterilization) की जाए और उन्हें वापस वहीं छोड़ दिया जाए। कानून कहता है कुत्तों की आबादी को नियंत्रित करने का यही एकमात्र मान्य तरीका है। अदालतों ने सुझाव दिया है कि कुत्तों को खाना खिलाने के लिए खास जगहें तय हों ताकि वे खाने के लिए आक्रामक न हों। लेकिन धरातल पर प्रशासन की सुस्ती और संसाधनों की कमी के कारण ये नियम केवल कागजों तक सीमित रह जाते हैं। जब सिस्टम फेल होता है, तो गुस्सा आम जनता और जानवरों के बीच हिंसा के रूप में निकलता है।
अक्सर हम कुत्तों को दोष देते हैं, लेकिन समस्या की एक बड़ी जड़ हमारा कचरा प्रबंधन भी है। सड़कों पर खुले में पड़ा खाना और मीट की दुकानों के बाहर बचा हुआ मांस कुत्तों को हिंसक और इलाका-परस्त (Territorial) बनाता है। जब तक शहरों की सफाई व्यवस्था दुरुस्त नहीं होगी, आवारा कुत्तों की संख्या और उनका व्यवहार नियंत्रित करना मुश्किल होगा।
यह बहस केवल अदालतों में नहीं जीती जा सकती। इसके लिए सामाजिक जिम्मेदारी की जरूरत है नगर निगमों को नसबंदी और रेबीज के टीकों का अभियान युद्ध स्तर पर चलाना होगा। जो लोग कुत्तों को खाना खिलाते हैं, उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इससे दूसरों को खतरा न हो। विदेशी नस्लों के पीछे भागने के बजाय यदि हम भारतीय नस्ल (Indie Dogs) को गोद लें, तो सड़कों पर उनकी संख्या कम होगी।
इंसान और कुत्ता सदियों से साथ रहते आए हैं। कुत्ता इंसान का सबसे पुराना दोस्त माना जाता है। आज अगर यह रिश्ता खूनी संघर्ष में बदल रहा है, तो इसका मतलब है कि कहीं न कहीं हमने व्यवस्था बनाने में गलती की है। हमें एक ऐसे मध्यम मार्ग की जरूरत है जहाँ “डर-मुक्त गलियां” और “क्रूरता-मुक्त समाज” दोनों का अस्तित्व हो। कोई भी कानून तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक उसमें इंसानियत और सुरक्षा का बराबर का समावेश न हो।



