
17 अप्रैल, 2026 की शाम भारतीय संसदीय इतिहास में एक ऐसे दिन के रूप में दर्ज हो गई है, जिसने सत्ता पक्ष को स्तब्ध और विपक्ष को एक नई ऊर्जा से भर दिया है। केंद्र सरकार द्वारा लाया गया ‘नारी शक्ति वंदन और परिसीमन’ (131वां संविधान संशोधन) विधेयक, 2026 लोकसभा की दहलीज पर गिर गया है। विशेष सत्र के तीसरे दिन, जब देश को उम्मीद थी कि 2029 के चुनावों के लिए एक नया लोकतांत्रिक ढांचा तैयार होगा, तब सरकार आवश्यक दो-तिहाई (2/3) विशिष्ट बहुमत जुटाने में विफल रही।
विधेयक के गिरने के तुरंत बाद, संसद भवन के गलियारों से लेकर गांधी प्रतिमा तक ‘नारेबाजी’ और ‘विरोध’ का ऐसा मंजर दिखा, जो दशकों में नहीं देखा गया। भाजपा और एनडीए के सांसदों ने सदन के भीतर और बाहर ‘महिला विरोधी विपक्ष’ के नारे लगाते हुए संसद परिसर को घेर लिया।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत किसी भी संविधान संशोधन के लिए दो शर्तों का पूरा होना अनिवार्य है: (1) सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत (272+), और (2) उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों का कम से कम दो-तिहाई (2/3) बहुमत। सदन में मतदान के समय 528 सदस्य उपस्थित थे। विधेयक को पारित करने के लिए कम से कम 352 वोटों की आवश्यकता थी।
सरकार के पक्ष में केवल 298 वोट पड़े, जबकि विपक्ष ने एकजुट होकर 230 वोट विरोध में डाले। सरकार जादुई आंकड़े से 54 वोट पीछे रह गई। सूत्रों के अनुसार, एनडीए के कुछ घटक दलों के सदस्यों की अनुपस्थिति और कुछ निर्दलीय सांसदों के ऐन वक्त पर पाला बदलने के कारण यह स्थिति उत्पन्न हुई।
जैसे ही लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने घोषणा की कि “विधेयक के पक्ष में विशिष्ट बहुमत नहीं है, अतः विधेयक को अस्वीकार किया जाता है,” सदन के भीतर हंगामा शुरू हो गया। प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के नेतृत्व में एनडीए के सैकड़ों सांसद संसद परिसर में स्थित महात्मा गांधी की प्रतिमा के पास धरने पर बैठ गए। महिला सांसदों ने काली पट्टियाँ बाँधकर विपक्ष के खिलाफ प्रदर्शन किया। “नारी शक्ति का अपमान, नहीं सहेगा हिंदुस्तान”, “संघीय ढांचे के नाम पर महिलाओं का हक मारा”, “2029 में देश जवाब देगा”। संसदीय कार्य मंत्री ने मीडिया से बात करते हुए इसे “लोकतंत्र का काला दिन” बताया और कहा कि कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों ने अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए करोड़ों महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बंधक बना लिया है।
दूसरी ओर, ‘INDIA’ गठबंधन के सांसदों ने एक-दूसरे को बधाई दी और इसे राज्यों के अधिकारों की जीत बताया। विपक्ष का मुख्य तर्क यह था कि 850 सीटों का विस्तार केवल जनसंख्या (2011) पर आधारित है, जो दक्षिण भारतीय राज्यों के लिए अन्यायपूर्ण है। तमिलनाडु और केरल के सांसदों ने तर्क दिया कि सरकार महिला आरक्षण की आड़ में उत्तरी राज्यों की सीटों को ‘कृत्रिम’ रूप से बढ़ाना चाहती थी। विपक्ष के नेता ने कहा “हम महिला आरक्षण के साथ हैं, लेकिन हम उस ‘हिडन एजेंडे’ (Hidden Agenda) के खिलाफ हैं जो भारत की विविधता को नष्ट करना चाहता है। सरकार को परिसीमन और महिला आरक्षण को अलग-अलग पेश करना चाहिए था।”
इस विधायी विफलता ने सरकार के पूरे भविष्य के रोडमैप को अस्त-व्यस्त कर दिया है अब 2029 के आम चुनाव मौजूदा 543 सीटों पर ही होने की संभावना है। नया संसद भवन, जो 888 सदस्यों के लिए बनाया गया था, अभी कुछ और समय तक खाली रहेगा। चूंकि आरक्षण का क्रियान्वयन परिसीमन से जुड़ा था, इसलिए अब 33% आरक्षण को 2029 में लागू करना संवैधानिक रूप से असंभव हो गया है। संविधान संशोधन विफल होते ही सरकार ने ‘परिसीमन विधेयक, 2026’ और ‘UT कानून संशोधन’ को औपचारिक रूप से वापस ले लिया है।
यह घटनाक्रम अब आगामी विधानसभा चुनावों और 2029 के आम चुनावों के लिए एक मुख्य मुद्दा बनेगा।
| राजनीतिक दल | भावी रणनीति (Strategy) |
| भाजपा (BJP) | इसे ‘नारी शक्ति’ बनाम ‘विपक्ष का अहंकार’ के रूप में पेश करेगी। महिला वोट बैंक को लामबंद करने के लिए देशव्यापी रैलियां की जाएंगी। |
| क्षेत्रीय दल (DMK, TMC, BRS) | इसे अपनी क्षेत्रीय अस्मिता और जनसंख्या नियंत्रण के सफल मॉडल की जीत के रूप में प्रचारित करेंगे। |
| कांग्रेस (Congress) | ‘महिला आरक्षण के भीतर ओबीसी कोटा’ की अपनी पुरानी मांग को और तेज करेगी, यह दावा करते हुए कि सरकार का बिल ‘अधूरा’ था। |
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, सरकार के पास अभी भी कुछ विकल्प शेष हैं सरकार परिसीमन के क्लॉज को हटाकर केवल ‘महिला आरक्षण’ का सीधा बिल ला सकती है, जिसे पारित करना आसान होगा। संविधान संशोधन के मामले में ‘संयुक्त सत्र’ (Joint Session) बुलाने का प्रावधान नहीं है (अनुच्छेद 368 के तहत)। अतः सरकार को दोनों सदनों में अलग-अलग बहुमत साबित करना ही होगा।सरकार इस मुद्दे को लेकर जनता के बीच जा सकती है और विपक्ष पर दबाव बनाने के लिए राज्यों की विधानसभाओं में प्रस्ताव पारित करवा सकती है।
17 अप्रैल 2026 की शाम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारतीय राजनीति में ‘आम सहमति’ अभी भी एक दुर्लभ वस्तु है। 850 सीटों का प्रस्ताव आधुनिक भारत की आवश्यकता हो सकता था, लेकिन इसके साथ जुड़ी राजनीतिक असुरक्षाओं ने इसे पटरी से उतार दिया। एनडीए का विरोध प्रदर्शन यह संकेत दे रहा है कि यह लड़ाई अब संसद से निकलकर सड़क पर जाएगी।
भारत की महिलाएं, जो 33% आरक्षण का दशकों से इंतजार कर रही थीं, एक बार फिर खुद को कूटनीतिक शतरंज की बिसात पर फंसा हुआ पा रही हैं। अब गेंद सरकार के पाले में है क्या वह झुककर समझौता करेगी या 2029 के लिए एक नया और अधिक समावेशी एजेंडा पेश करेगी?



