अंतरराष्ट्रीयराजनीति

राजनीति, शक्ति और न्याय का द्वंद्व: ट्रंप-एपस्टीन विवाद का विस्तृत विश्लेषण

एपस्टीन की काली विरासत और न्याय प्रणाली पर सवाल

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा दोषी यौन अपराधी जेफरी एपस्टीन के साथ किसी भी प्रकार की संलिप्तता के आरोपों को पुरजोर तरीके से खारिज करना, आधुनिक अमेरिकी राजनीति के सबसे विवादित अध्यायों में से एक को फिर से खोल चुका है। ट्रंप का यह दावा कि वे जांच में “पूरी तरह से दोषमुक्त” (Totally Exonerated) पाए गए हैं, न केवल एक व्यक्तिगत बचाव है, बल्कि यह अमेरिकी न्याय प्रणाली, मीडिया की भूमिका और राजनीतिक ध्रुवीकरण पर एक गहरा प्रहार भी है।

जेफरी एपस्टीन का नाम दुनिया भर में यौन शोषण, मानव तस्करी और सत्ता के दुरुपयोग के एक भयानक पर्याय के रूप में जाना जाता है। एपस्टीन की 2019 में जेल में हुई रहस्यमयी मौत के बाद से ही उसके साथ जुड़े हर शक्तिशाली नाम पर जांच और संदेह की तलवार लटकी रही है। जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में इन आरोपों को “राजनीतिक रूप से प्रेरित” बताकर खारिज किया, तो उन्होंने एक बार फिर वाशिंगटन की राजनीति में हड़कंप मचा दिया।

डोनाल्ड ट्रंप का मुख्य तर्क यह है कि संघीय जांच एजेंसियों (FBI) और न्याय विभाग (DOJ) द्वारा की गई गहन जांच के बावजूद उनके खिलाफ कोई भी साक्ष्य नहीं मिला। ट्रंप का कहना है कि वर्षों से चल रही मीडिया ट्रायल और विपक्षी जांचों के बाद भी उनकी संलिप्तता का कोई सबूत नहीं मिलना ही उनकी सबसे बड़ी जीत है। वे इसे अपने विरोधियों द्वारा किया गया एक ‘फेक नैरेटिव’ करार देते हैं।

ट्रंप ने कभी इस बात को नहीं छुपाया कि वे 1990 के दशक और 2000 की शुरुआत में एपस्टीन को जानते थे। उन्होंने एक बार एपस्टीन को “शानदार व्यक्ति” (Terrific Guy) भी कहा था, लेकिन उनका तर्क है कि जैसे ही उन्हें एपस्टीन की संदिग्ध गतिविधियों का पता चला, उन्होंने उससे सारे रिश्ते तोड़ लिए थे।

ट्रंप के बयानों ने अमेरिकी राजनीतिक हलकों को दो ध्रुवों में बांट दिया है, जिससे यह मुद्दा अब कानूनी से ज्यादा वैचारिक बन गया है।ट्रंप के सहयोगियों का तर्क है कि एपस्टीन मुद्दे को बार-बार उठाना ‘डेमोक्रेटिक पार्टी’ की एक सोची-समझी रणनीति है। उनका मानना है कि जब देश आर्थिक चुनौतियों और भू-राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा है, तब पुराने और सुलझ चुके मुद्दों को उठाना जनता का ध्यान भटकाने जैसा है। आलोचक, जिनमें नागरिक अधिकार कार्यकर्ता और कानूनी विशेषज्ञ शामिल हैं, का मानना है कि “दोषमुक्ति” का अर्थ यह नहीं है कि सवाल पूछना बंद कर दिया जाए। उनकी मांग है कि एपस्टीन से जुड़ी ‘सील’ की गई फाइलों को पूरी तरह सार्वजनिक किया जाए ताकि यह स्पष्ट हो सके कि किसने क्या देखा और किसने क्या किया।

यह विवाद केवल ट्रंप तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रतीक है कि कैसे अमेरिका के ‘अभिजात वर्ग’ (Elite Class) ने लंबे समय तक कानून की अनदेखी की। एफबीआई और अमेरिकी अटॉर्नी जनरल के कार्यालय पर यह आरोप लगता रहा है कि उन्होंने एपस्टीन के मामले को दबाने में ढिलाई बरती। ट्रंप का बचाव भी इसी अविश्वास के घेरे में आता है। इस पूरे राजनीतिक ड्रामे के बीच उन पीड़ित महिलाओं की आवाजें अक्सर दब जाती हैं जो अभी भी इंसाफ की उम्मीद कर रही हैं। उनके लिए किसी भी शक्तिशाली व्यक्ति द्वारा दिया गया “दोषमुक्ति” का दावा उनके जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा होता है।

ट्रंप का यह रुख उनकी आने वाली राजनीतिक लड़ाइयों के लिए भी महत्वपूर्ण है। ट्रंप जानते हैं कि जब वे खुद को “राजनीतिक प्रतिशोध” का शिकार बताते हैं, तो उनका समर्थक आधार और अधिक मजबूत हो जाता है। वे इस विवाद को “डीप स्टेट” (Deep State) के खिलाफ अपनी लड़ाई के रूप में पेश कर रहे हैं। दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति पर इस तरह के पुराने और विवादित मामलों का साया पड़ना अमेरिकी कूटनीति के लिए भी चुनौतीपूर्ण होता है। मित्र देशों और प्रतिद्वंद्वियों दोनों की नजर इस बात पर होती है कि अमेरिकी लोकतंत्र अपने नेतृत्व की नैतिक जवाबदेही को कैसे संभालता है।

इस विवाद को हवा देने में मीडिया की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। जहाँ एक तरफ स्वतंत्र पत्रकारों ने एपस्टीन के काले कारनामों को उजागर किया, वहीं दूसरी तरफ कुछ मीडिया संस्थानों पर पक्षपाती होने के आरोप लगे हैं। ट्रंप ने सीधे तौर पर “मेनस्ट्रीम मीडिया” को उनके खिलाफ दुष्प्रचार करने का दोषी ठहराया है।

डोनाल्ड ट्रंप का यह कहना कि वे “पूरी तरह दोषमुक्त” हैं, कानूनी तौर पर एक मजबूत स्थिति हो सकती है, लेकिन सामाजिक और राजनीतिक धारणाओं के युद्ध में यह पर्याप्त नहीं है। एपस्टीन मामला एक ऐसा दलदल है जिसकी गहराई अभी भी पूरी तरह मापी नहीं गई है।

सच्चाई केवल तभी सामने आएगी जब न्याय प्रक्रिया पारदर्शी हो और किसी भी पद या रसूख को कानून के ऊपर न माना जाए। ट्रंप के हालिया बयानों ने निश्चित रूप से इस ठंडी पड़ रही राख को फिर से सुलगा दिया है। अब यह आने वाला समय बताएगा कि क्या यह विवाद केवल एक राजनीतिक शोर बनकर रह जाएगा या इससे अमेरिकी राजनीति में किसी बड़े सुधार की नींव रखी जाएगी।

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