
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के छात्रसंघ चुनावों के परिणाम घोषित कर दिए गए हैं। इस बार के चुनावों में वाम एकता (Left Unity) ने ऐतिहासिक जीत दर्ज करते हुए चारों केंद्रीय पदों पर कब्ज़ा जमाया है। अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महासचिव और संयुक्त सचिव — सभी चार पदों पर वाम गठबंधन के उम्मीदवार विजयी रहे। यह जीत एक बार फिर साबित करती है कि जेएनयू में वामपंथी विचारधारा का प्रभाव अब भी गहराई से कायम है।
इस बार लगभग 9,000 से अधिक छात्रों ने मतदान के लिए पंजीकरण कराया था। चुनाव में लगभग 67 प्रतिशत मतदान हुआ, जो पिछले साल के मुकाबले थोड़ा कम रहा। मतदान 5 नवम्बर को शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ था, जबकि मतगणना का काम 6 नवम्बर की शाम से शुरू होकर 7 नवम्बर की सुबह तक चला।
मतगणना के दौरान कैंपस में जबरदस्त उत्साह देखा गया। अलग-अलग छात्र संगठन अपने समर्थकों के साथ पूरी रात कैंपस में मौजूद रहे। कई बार मतगणना की रफ्तार धीमी होने पर समर्थकों में बेचैनी भी देखी गई, लेकिन पूरा माहौल उत्सव जैसा बना रहा
वाम एकता की रणनीति हुई सफल
इस चुनाव में वाम एकता (AISA, SFI, AISF और DSF का गठबंधन) ने एकजुटता के साथ चुनाव लड़ा। उनके मुख्य मुद्दों में कैंपस स्वायत्तता, फीस वृद्धि का विरोध, लैंगिक समानता और शिक्षा के व्यावसायीकरण के खिलाफ़ संघर्ष प्रमुख थे।
अध्यक्ष पद की विजेता आदिति मिश्रा ने अपनी जीत के बाद कहा- “यह जीत जेएनयू के छात्रों की आवाज़ है, जिन्होंने लोकतांत्रिक और समावेशी परिसर की परंपरा को बनाए रखने के पक्ष में वोट दिया है।”
एबीवीपी ने हार स्वीकार की, कहा—‘लड़ाई जारी रहेगी’
एबीवीपी ने चारों केंद्रीय पदों पर हार के बावजूद कहा कि वह छात्र हितों के लिए संघर्ष जारी रखेगी। संगठन की ओर से कहा गया- “हम परिणाम का सम्मान करते हैं, लेकिन हम जेएनयू में विचारों की विविधता बनाए रखने के लिए अपनी भूमिका निभाते रहेंगे।”
एबीवीपी ने कैंपस में राष्ट्रीय शिक्षा नीति, छात्रवृत्ति में पारदर्शिता और छात्रावास सुविधाओं के सुधार जैसे मुद्दों को उठाया था। परंतु वाम गठबंधन ने इन मुद्दों को अपने सामाजिक और विचारधारात्मक एजेंडे से जोड़कर व्यापक समर्थन हासिल किया।
चुनावों के दौरान विश्वविद्यालय का माहौल पूरी तरह राजनीतिक बहसों और छात्र उत्साह से भरा रहा। हॉस्टलों की दीवारें नारों, पोस्टरों और बैनरों से सज गईं। रात भर बहसें, घोषणाएँ और नारेबाज़ी का दौर चलता रहा।
छात्रों ने इसे “लोकतंत्र का त्यौहार” बताया। कई वरिष्ठ अध्यापकों ने कहा कि जेएनयू की छात्र राजनीति हमेशा विचारों की विविधता और तर्कसंगत संवाद का प्रतीक रही है।
मतदान दर में हल्की गिरावट पर चिंता
पिछले कुछ वर्षों की तुलना में इस बार मतदान प्रतिशत थोड़ा कम रहा। 2024 के चुनाव में जहां लगभग 70 प्रतिशत छात्रों ने वोट डाला था, वहीं इस बार यह आँकड़ा 67 प्रतिशत पर सिमट गया।
कुछ पर्यवेक्षकों का मानना है कि लगातार शैक्षणिक सत्रों की व्यस्तता और ऑनलाइन क्लासों के कारण छात्रों की राजनीतिक भागीदारी पर असर पड़ा है
पिछले चुनावों में एबीवीपी ने कुछ पदों पर कड़ा मुकाबला दिया था और महासचिव पद पर जीत भी हासिल की थी, लेकिन इस बार वाम एकता ने पूर्ण बहुमत से वापसी की है। विश्लेषकों का कहना है कि एबीवीपी को इस बार कैंपस के अंदरूनी मुद्दों पर छात्रों का विश्वास हासिल करने में कठिनाई हुई।
छात्र संगठनों की प्रतिक्रियाएँ
वाम एकता ने अपनी जीत को “विचारधारा की जीत” बताया। वहीं BAPSA और NSUI जैसे संगठनों ने भी कहा कि वे कैंपस के लोकतांत्रिक माहौल को बनाए रखने के लिए संघर्ष जारी रखेंगे।
कुछ स्वतंत्र उम्मीदवारों ने आरोप लगाया कि बड़े गुटों के बीच छोटे समूहों की आवाज़ दब जाती है। चुनाव आयोग ने सभी पक्षों से संयम और संवाद बनाए रखने की अपील की है।
राजनीतिक विश्लेषण
विश्लेषकों का कहना है कि जेएनयू का चुनाव देश की युवा राजनीति की दिशा को भी संकेत देता है। वाम दलों की यह जीत उस समय आई है जब राष्ट्रीय स्तर पर छात्र राजनीति में दक्षिणपंथी संगठनों का प्रभाव बढ़ा है। ऐसे में जेएनयू का यह परिणाम प्रतीकात्मक रूप से “विचारधारात्मक विविधता” का संदेश देता है।
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक जेएनयू की छात्र राजनीति हमेशा राष्ट्रीय राजनीति का आइना रही है। विश्वविद्यालय के अंदर जो मुद्दे गूंजते हैं, वे अक्सर देश की राजनीति में भी सुनाई देते हैं — जैसे शिक्षा में समान अवसर, फीस नीति, और स्वतंत्र अभिव्यक्ति का अधिकार।


