
भारत एक ऐसा देश है जहाँ समुद्री तटों पर रहने वाले लाखों लोग चक्रवात और तूफानों के खतरे के प्रति संवेदनशील हैं। हाल ही में भारत के दक्षिणी तटों की ओर बढ़ता हुआ चक्रवात डिटवाह इस खतरे को और ज़्यादा गंभीर बना रहा है। इस खतरे ने हमें यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या भारत का तटीय इलाका जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को झेलने और उससे बचाव के लिए तैयार है?
डिटवाह चक्रवात ने श्रीलंका के तटों को भारी तबाही पहुंचाने के बाद अब भारत के तमिलनाडु, पुडुचेरी और आंध्र प्रदेश के तटों की ओर तेज़ी से बढ़ना शुरू कर दिया है। भारत मौसम विभाग (IMD) ने तमिलनाडु के कावेरी डेल्टा जिलों के लिये रेड अलर्ट और पुडुचेरी, करैकल तथा दक्षिण आंध्र प्रदेश के तटों के लिए ऑरेंज अलर्ट जारी किया है। इसमें भारी बारिश, तेज़ हवाओं और समुद्र में उथल-पुथल की संभावना है, जिससे इन क्षेत्रों में बाढ़, घरों के बहने और तमाम सामाजिक-आर्थिक परेशानियां पैदा हो सकती हैं।
जलवायु परिवर्तन की वजह से चक्रवातों की तीव्रता और आवृत्ति में लगातार वृद्धि हो रही है। समुद्र का तापमान अधिक होने की वजह से तूफान तेज़ और जानलेवा होते जा रहे हैं, और मानसून प्रणाली में बदलाव के कारण वे शुरू होने के समय व स्थान में बदलाव कर रहे हैं। यही कारण है कि भारत के तटीय क्षेत्रों में आने वाले तूफान ने पिछले वर्षों की तुलना में अब अधिक विनाशकारी स्वरूप लिया है।
भारत सरकार ने पिछले दशक में आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में कई सुधार किए हैं। राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) का गठन, तटीय बचाव केंद्र, और टेलीमेटरी प्रणाली जैसे कदम भारत की जलवायु सहनशीलता को बढ़ाने की कोशिशें हैं। बचाव और राहत कार्यों को और भी बेहतर बनाने के लिए स्थानीय प्रशासन लगातार तैयारी करता रहता है। हालांकि, इन प्रयासों के बावजूद अनेक ग्रामीण और गरीब समुदाय अभी भी अत्यधिक जोखिम के सामने हैं क्योंकि उनमें जागरूकता, संसाधन एवं तकनीकी सहायता की कमी है।
तटीय संरचनाओं की मजबूती, समुद्री पारिस्थितिक तंत्र की रक्षा और वन संरक्षण जलवायु संकट का मुकाबला करने में बेहद जरूरी हैं। इसके अलावा आपदा-प्रबंधन के प्रति जनता की जागरूकता और बचाव-प्रक्रियाओं की स्पष्ट समझ जीवन रक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। प्रशासन को चाहिए कि वह तटीय इलाकों में नियमित बचाव अभ्यास करवाए, और बच्चों, बुजुर्गों तथा अनाथों को विशेष सहायता सुनिश्चित करे।
शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में जल निकासी तंत्रों को सुदृढ़ करना, साथ ही स्थायी बाढ़ नियंत्रण उपाय स्थापित करना आवश्यक है। गरीब समुदायों की सुरक्षा प्राथमिकता होनी चाहिए क्योंकि वे ऐसी आपदाओं के प्रभावों को सबसे पहले और गहराई से झेलते हैं।
सिविल सोसाइटी, गैर-सरकारी संस्थान और स्थानीय समूहों को भी इस क्रिज़िस में सामूहिक भूमिका निभानी होगी ताकि आपदा के समय आराम, चिकित्सा, भोजन एवं पुनर्वास सुचारू रूप से किया जा सके। सोशल मीडिया एवं मोबाइल ऐप्स के माध्यम से शीघ्र सूचना प्रसारित करना जन-मानस को सतर्क करने का एक प्रभावी तरीका है।
आर्थिक रूप से भी प्राकृतिक आपदाएं बड़ा झटका देती हैं। फसलें खराब होने, मछुआरों की आजीविका छिनने, और बुनियादी व्यवस्था के ठप्प होने का व्यापक असर होता है। इसीलिए जलवायु-तैयारी के तहत ऐसे आर्थिक सुरक्षा जाल विकसित किए जाने चाहिए जो प्रभावित परिवारों को तत्काल सहायता प्रदान कर सकें।
डिटवाह चक्रवात की उग्रता और तेज़ी से बढ़ती हुई जलवायु संकट की इस चुनौती ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत को जल्द से जल्द एक मजबूत, व्यापक और क्रियाशील ‘जलवायु-तैयार’ आपदा प्रबंधन योजना लागू करनी होगी। इसमें वैज्ञानिक अनुसंधान, तकनीकी नवाचार, प्रशासनिक दक्षता, और समर्पित जनभागीदारी शामिल होनी चाहिए।
इस संकट ने हमें यह सिखाया है कि केवल प्राकृतिक आपदाओं की प्रतिक्रियात्मक तैयारी से काम नहीं चलेगा, बल्कि प्रक्रिया और संरचना दोनों को परिस्थितियों के अनुकूल बनाना होगा। जलवायु संकट की गंभीरता को समझकर, हमें अपने तटीय इलाकों की सुरक्षा के लिए सतत् और भविष्य-उन्मुख रणनीतियां बनानी होंगी।
भारत जैसे विशाल लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि वह अपने नागरिकों को सुरक्षित रख सके, प्राकृतिक आपदाओं का सामना कर सके और जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चुनौतियों का सामना सामूहिक, ठोस और कारगर रूप से कर सके। डिटवाह और इसी प्रकार के खतरों ने हमें सशक्त कार्रवाई के लिए प्रेरित किया है, और उम्मीद करता है कि हम अब इसे नजरअंदाज नहीं करेंगे।



