ओपिनियन
-
AI इन न्यूज़रूम: सच्चाई का नया सहारा या अफवाहों का खतरा?
भारत में न्यूज़रूम का परिदृश्य अब AI के चलते लगातार बदल रहा है। AI टेक्नोलॉजी न केवल हेडलाइन्स और आर्टिकल…
Read More » -
हिमालय से हाइवे तक: विकास और आपदा के बीच नाजुक संतुलन
हिमालय की ऊँचाइयों से लेकर मैदानों की बड़ी–बड़ी हाईवे परियोजनाओं तक, विकास और आपदा के बीच की लड़ाई लगातार नाजुक…
Read More » -
दिल्ली से काठमांडू तक: डिजिटल स्वतंत्रता की जंग में Gen Z सबसे आगे
नेपाल में 2025 में हुए सोशल मीडिया बैन के विरोध ने न सिर्फ हिमालयी देश को हिला दिया बल्कि पूरे…
Read More » -
BRICS विस्तार: क्या भारत दोस्ती और प्रतिस्पर्धा के बीच संतुलन कायम कर पाएगा?
BRICS का विस्तार विश्व राजनीति और अर्थव्यवस्था की एक नई बहस छेड़ रहा है। भारत सहित कई प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं…
Read More » -
E20 ईंधन विवाद: हरियाली की राह या विकल्पहीन भ्रम?
E20 ईंधन विवाद आज भारत की ऊर्जा नीति, पर्यावरण और उपभोक्ता अधिकार को लेकर बड़ी बहस बन चुका है। नीति…
Read More » -
पर्वतीय पर्यटक स्थलों पर बाढ़: मौसम का कहर या मानवजनित भूलें
हिमालय के सुंदर पहाड़ी शहर, जो कभी नील वर्णी नदियों, शांत घाटियों और हरित वनस्पतियों के लिए जाने जाते थे,…
Read More » -
बॉलीवुड से सुप्रीम कोर्ट तक: कैसे व्यक्तित्व अधिकार रचनात्मकता को नया आयाम दे रहे हैं
बॉलीवुड की रंगीन दुनिया से सुप्रीम कोर्ट की गंभीरता तक, आज ‘व्यक्तित्व अधिकार’ यानी Personality Rights की चर्चा अचानक हर…
Read More » -
क्या बोलने की आज़ादी पर फ़िल्टर होना चाहिए? आलोचना और अवमानना के बीच की पतली रेखा
भारतीय लोकतंत्र में बोलने की आज़ादी को अत्यंत मूल्यवान अधिकार माना गया है, लेकिन बदलते समय में इससे जुड़े सवाल…
Read More » -
राजनीति में महिलाओं का आरक्षण: प्रतीकवाद या असली सशक्तिकरण?
भारतीय राजनीति में महिलाओं के लिए आरक्षण का सवाल न सिर्फ प्रतिनिधित्व, बल्कि सामाजिक न्याय, लैंगिक बराबरी और लोकतंत्र की…
Read More » -
UCC: समानता की ओर या विविधता का संकट?
भारतीय समाज में “समान नागरिक संहिता” यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) पर चर्चा जितनी जरूरी है, उतनी ही जटिल और…
Read More » -
मासिक धर्म अवकाश नीति: प्रगति या कार्यस्थल में नई खाई?
मासिक धर्म छुट्टी नीति एक ओर इसे प्रगतिशील कदम के रूप में सराहा जा रहा है, दूसरी ओर इसके सामाजिक…
Read More » -
फ्रांस में लोकतंत्र की थकान: एक वर्ष में तीसरे प्रधानमंत्री का इस्तीफा और बढ़ती अस्थिरता
फ्रांस में बार-बार बदलती प्रधानमंत्री की कुर्सी, खासकर फ्रांस्वा बायरू के हालिया इस्तीफे के बाद, देश के लोकतंत्र में गहरी…
Read More »



