ओपिनियन

फेक न्यूज़ का उभार : अफवाहों का सैलाब

सोशल मीडिया का बदलता स्वरूप

आज के डिजिटल युग में, सूचना की पहुंच जितनी तेज और व्यापक हुई है, उतना ही भ्रमक सामग्री अर्थात् मिथ्या या झूठी सूचना का खतरा भी हर समाज के लिए बढ़ गया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, जो कभी सर्वसुलभ संवाद व लोकतांत्रिक विमर्श के वाहक माने गए, आज भ्रम व अफवाहों के सबसे शक्तिशाली माध्यम में बदलते जा रहे हैं। इंटरनेट, फेसबुक, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम, यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म्स ने हर नागरिक को खबर प्रसारित करने का अधिकारी तो बना दिया, पर इसके साथ ही जिम्मेदारी और जांच की भावना भी कमजोर पड़ गई। इसका सीधा असर समाज की सोच, सार्वजनिक विश्वास और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर पड़ रहा है।

गलत सूचना या फेक न्यूज अब मीडिया की हेडलाइन बनती है, कभी यह राजनैतिक दलों और सरकार के प्रचार का हिस्सा होती है तो कभी बिना तथ्यों की पुष्टि किए वायरल सनसनी के तौर पर घर-घर पहुंचती है। चुनावी मौसम में यह प्रवृत्ति और तीव्र हो जाती है कभी जातिगत, कभी धार्मिक ध्रुवीकरण, कभी सामाजिक डीलडौल या स्वास्थ्य संबंधी भ्रामक बातें जनता का ध्यान बंटाती हैं। दुखद पक्ष यह भी है कि लोगों ने बार-बार दोहराई गयी अफवाहों को सच मानना शुरू कर दिया है यह “पोस्ट-ट्रुथ” है जिसमें विशेषज्ञों की जगह हाई वॉल्यूम वाली, भावनाओं पर चोट करने वाली सामग्री लोकप्रिय हो गई है।

ऐसे में फेक न्यूज समाज के लिए बहु-स्तरीय संकट खड़ा कर देती है। सार्वजनिक नीतियों, स्वास्थ्य अभियानों या मतदान में भटकाव पैदा कर, सोशल मीडिया का यह चेहरा सीधा लोकतंत्र की नींव को कमजोर करता है। कई दफा अफवाहों के चलते हिंसा, दंगे, मॉब लिंचिंग जैसी घटनाएं और समुदायों में अविश्वास जैसी समस्याएं पैदा होती हैं। दूसरी ओर, नागरिकों का समाचार, सरकार, प्रशासन, चुनाव आयोग या न्यायपालिका जैसी संस्थाओं पर भरोसा टूटने लगता है, जिससे जनमत का अपहरण संभव हो जाता है। समाज के भीतर झूठ, जाति-संप्रदाय की दूरी, डर और अविश्वास तेजी से पनपते हैं।

सोशल मीडिया की एल्गोरिदम-आधारित खबर वितरण प्रणाली भी इस समस्या को आगे बढ़ाती है। ऐसी सामग्री, जो सनसनीखेज, भावनात्मक या ध्रुवीकारी हो, वह अधिक वायरल होती है चाहे उसमें तथ्य हो या न हो। व्यक्ति का न्यूज फीड उसका इको चैंबर बन जाता है जहां, हमेशा वैसी ही बातें दिखती और सुनाई देती हैं, जैसी उसकी सोच पहले से है। यह द्वैत समाज और विचार-विमर्श दोनों में तीव्रता लाता है, और स्वस्थ लोकतांत्रिक बहस के लिए जगह कम कर देता है। बच्चों और युवाओं के लिए इन फर्जी खबरों की सही-गलत पहचान करना और भी मुश्किल है, जिससे उनके दृष्टिकोण पर दीर्घकालिक असर पड़ सकता है।

राष्ट्रीय सुरक्षा के स्तर पर, फेक न्यूज और सोशल मीडिया पर कट्टरपंथी संदेश विदेशी ताकतों, आतंकी संगठनों और असामाजिक तत्वों द्वारा भी फैलाए जाते हैं। ऐसे संदेश समाज में भगदड़, अविश्वास और सत्ता के प्रति असंतोष पैदा कर सकते हैं, जिसकी वजह से देश के सामूहिक मनोदशा, चुनाव और नीति-निर्माण तक प्रभावित हो सकते हैं। हालिया वर्षों में भारत में कई बार फेसबुक, ट्वीटर, इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफार्म्स पर चल रही फर्जी मुहिमों, एडिटेड वीडियो या हेट स्पीच के चलते प्रशासन को कड़ी कार्रवाई करनी पड़ी है।

समस्या यह है कि इस विघटनकारी बदलाव का प्रभाव बहुत तेजी से और बड़े स्तर पर होता है जिसमें विज्ञान, तर्क, पत्रकारों की पड़ताल या सच्चे आंकड़ों का शोर दब जाता है। कानून और नीतियाँ संक्रमणशील हैं, नियमन के उपाय धीरे चलते हैं, लेकिन मिसइन्फॉर्मेशन हमेशा एक कदम आगे निकल जाती है। यही वजह है कि जनता में आलोचनात्मक सोच, डिजिटल साक्षरता और सत्यापन की आदत का विकास आज की सबसे बड़ी जरूरत है। हर नागरिक को यह आदत डालनी होगी कि कोई भी खबर पड़ने, सुनने या साझा करने से पहले उसके स्रोत, तथ्य और मंशा की पड़ताल अवश्य करे।

इसी के साथ, खबरों के वितरण प्लेटफार्म्स, टेक कंपनियाँ और सरकार की साझेदारियों से सत्यापन, फैक्ट-चेकिंग और पारदर्शिता के उपायों को मजबूती मिलनी चाहिए। स्वतंत्र ऑडिटिंग, पारदर्शी एल्गोरिदम, जागरूकता अभियानों और स्कूल कॉलेज स्तर पर डिजिटल एजुकेशन से इस खतरे को रोका जा सकता है। सिर्फ कानून से समाधान नहीं निकलेगा, जब तक हम सामाजिक स्तर पर फैसले और संवाद के प्रति जवाबदेही, मूल्य और आत्मसाक्षात्कार को न अपनाएं।

इस नए युग में, जहां सूचना का ज्वार हर घर-बस्ती तक नितांत गहरायी से बह रहा है, हमें जिम्मेदार नागरिक और जागरूक सोशल मीडिया उपभोक्ता के रूप में खुद को तैयार करना होगा। सच-झूठ की कसौटी पर हर खबर को परखा जाए, फॉरवर्ड करने की बजाय स्वयं पढ़ने, पूछने और संदर्भ देखने की संस्कृति अपनायी जाए। विश्वास को बचाए रखने और लोकतंत्र की नींव को मजबूत करने का यही मार्ग है, वरना समाज और व्यवस्था ‘जानकारी’ की बाढ़ में ‘विश्वास’ को खो बैठेंगे।

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