ओपिनियनस्‍वास्‍थ्‍य

प्रिवेंटिव मेडिसिन: क्यों बदलती दुनिया को है इसकी ज़रूरत?

जेनेटिक टेस्टिंग: बीमारियों की छुपी कहानी

हमारे परिवारों में आज भी स्वास्थ्य के सवाल पर वही पुरानी सोच मिलती है बीमार पड़ेंगे, इलाज करवाएँगे, और सब ठीक हो जाएगा। लेकिन आज का ज़माना बदल चुका है। विज्ञान और तकनीक ने वह क्रांति कर दी है, जिससे अब हम इंतजार नहीं करते कि बीमारी दरवाज़े पर दस्तक दे, बल्कि कोशिश करते हैं कि बीमारी कभी आए ही ना। यह सोच, जो कभी आदत या संस्कृति का हिस्सा नहीं थी, अब ‘रोकथाम’ यानी प्रिवेंटिव मेडिसिन के रूप में तेजी से हमारी ज़िंदगी में, समाज में और दुनिया भर की स्वास्थ्य व्यवस्था में प्रवेश कर रही है।

अब रोगों के होने के बाद भागदौड़ करने के बजाय, आधुनिक तकनीक और विज्ञान के सहयोग से पहले से पता लगाया जा सकता है कि किसे किस बीमारी का कितना खतरा है, उनका कारण क्या है और इसे रोका कैसे जाए।रोग-प्रतिरोधक चिकित्सा यानी एक ऐसा दृष्टिकोण जिसमें इलाज से ज़्यादा ज़ोर इस बात पर है कि बीमारी की आशंका को ही जन्म न लेने दिया जाए।

कोरोना महामारी के बाद तो यह साफ़ हो गया कि केवल दवाइयाँ या अस्पताल रोग की गारंटी नहीं, बल्कि जीवनशैली, खानपान, जागरूकता और वक्त रहते स्वास्थ्य जांच का महत्व कहीं ज़्यादा है। आज की दुनिया में तनाव, असंतुलित आहार, प्रदूषण, और आनुवांशिकी कई बीमारियों को जन्म देते हैं। सिर्फ इलाज के भरोसे समाज स्वस्थ नहीं रह सकता बचाव, समय रहते चेतावनी और सतर्कता जरूरी है।

आज के दौर में तकनीकों ने हमें ऐसी सुविधा दी है, जिससे रोज़मर्रा की जिंदगी में स्वास्थ्य को लेकर सतर्क रहना कहीं आसान हो गया है। स्मार्ट वॉच, फिटनेस बैंड, मोबाइल हेल्थ एप्लीकेशन, ब्लड प्रेशर और ग्लूकोज मॉनिटर जैसी डिवाइसेज़ सामान्य आदमी की पहुंच में हैं। यह तकनीकें हार्ट रेट, नींद, दिनचर्या, ब्लड शुगर और अन्य बुनियादी संकेत निरंतर बताती रहती हैं। जरा सी गड़बड़ी हो, तो फोन पर ही अलर्ट मिल जाता है। पहले जहाँ चेकअप साल में एक बार या वह भी बीमारी की स्थिति में होता था, अब घर बैठे रोज़ाना छोटी-बड़ी जांच सम्भव है।

इनका सबसे बड़ा फायदा यह है कि व्यक्ति खतरे की शुरुआती घंटी सुन पाता है अब ब्लड प्रेशर बढ़ने से पहले ही सतर्क हुआ जा सकता है, रक्त में शुगर बढ़ने की दिशा समय रहते पकड़ी जा सकती है और आराम या व्यायाम में ज़रूरी फेरबदल किया जा सकता है।

सबसे बड़ी क्रांति जेनेटिक्स यानी आनुवांशिकता के क्षेत्र में आई है। पहले जहां यह वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं, रिसर्च अकादमियों या अमीर देशों तक सीमित था, आज जेनेटिक टेस्टिंग आम लोगों के लिए भी सुलभ होने लगी है। साधारण ब्लड या सेल सैंपल के जरिए यह जाना जा सकता है कि किसी व्यक्ति को जीवन में आगे चलकर कैंसर, दिल के रोग, डायबिटीज, अल्जाइमर, मोटापा या अन्य बीमारियों का कितना और किस तरह का जोखिम है।

अगर किसी महिला के जीन में खास बदलाव (जैसे BRCA म्यूटेशन) है, तो वह ब्रेस्ट या ओवरी कैंसर के जोखिम से पहले ही अवगत हो सकेगी, ताकि जरूरी जांच, टीका या लाइफस्टाइल बदलाव कर सके। बच्चों में आने वाले आनुवांशिक रोग, दवा के प्रभाव या एलर्जी जैसी समस्याएँ आगे न बढ़ें, इसके लिए भी पहले ही स्वास्थ्य योजना तैयार की जा सकती है।

बीते समय तक एक ही दवा या इलाज हज़ारों लोगों के लिए अनिवार्य समझा जाता था। पर हर व्यक्ति की जीवनशैली, शारीरिक संरचना और आनुवंशिक गुण अलग हैं। अब तकनीक और वैज्ञानिक शोध के कारण इलाज भी ‘पर्सनलाइज्ड’ हो गया है किसी को किस तरह की दवा, किस डोज में और किन पोषक तत्वों के साथ देनी चाहिए, यह सारी बातें डेवलप हो रही हैं। इससे साइडइफेक्ट्स कम होते हैं, इलाज ज्यादा असरदार होता है और समय तथा पैसे दोनों की बचत होती है।

मान लीजिए दो लोगों को रक्तचाप की समस्या है, पर एक के जीन या इतिहास में किडनी रोग का खतरा है और दुसरे में नहीं। दोनों का इलाज और बचाव अलग हो सकता है। ऐसे ही डायबिटीज, थायरॉयड, हार्मोन या ऑटोइम्यून रोगों में जनरल गाइडलाइन्स के बजाय पर्सनल मेडिकल प्लान बनना एक नई शुरुआत है।

पिछले दशक में स्वास्थ्य जागरूकता सिर्फ शहरों में नहीं, गाँवों, मोहल्लों, स्कूलों और दफ्तरों तक फैलने लगी है। कंपनियाँ अपने कर्मचारियों के लिए हेल्थ चेकअप, काउंसलिंग और फिटनेस प्रोग्राम शुरू कर चुकी हैं। स्कूल में बच्चों के BMI, पोषण, टीकाकरण और मेन्टल हेल्थ पर निवेश हो रहा है। राज्य और केंद्र सरकारें, शुरुआती जांच , वेक्सीनेशन अभियान और जीवनशैली से जुड़ी शिक्षा में निवेश कर रही हैं।

यह सब उस सोच को मजबूत करते हैं, जिसमें बीमारी न आए या जल्दी पकड़ में आ जाए तो इलाज आसान, सस्ता और सफल होगा।कोविड-19 ने दुनियाभर को सतर्कता, स्वच्छता, सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क, और वेक्सीनेशन का महत्व सिखाया। साथ ही, टेलिमेडिसिन यानि दूरस्थ स्वास्थ्य सलाह और ऑनलाइन डॉक्टर से परामर्श जैसी सुविधाएँ बेहद लोकप्रिय हो गईं। आज गाँव का बच्चा भी ऑनलाइन डॉक्टर से सलाह ले सकता है, समय-समय पर पोर्टल के ज़रिए हेल्थ रिकॉर्ड अपलोड कर सकता है। डिजिटल हेल्थ के इस युग ने चिकित्सा को जन-जन तक पहुँचाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है।

हालांकि रोकथाम वाली चिकित्सा में असीम संभावनाएँ हैं, पर इसकी राह में कई चुनौतियाँ भी हैं। गाँव या गरीब इलाकों में अभी भी सुविधाएँ और जागरूकता सीमित है। जेनेटिक टेस्टिंग या पर्सनलाइज्ड मेडिसिन की लागत बहुत से घरों की पहुँच से बाहर है। लोगों में गोपनीयता, डिजिटल डाटा और सुरक्षा को लेकर डर भी है। कहीं-कहीं तकनीका के दुरूपयोग या गलत डेटा की वजह से चिंता बढ़ी है।

इसके अलावा, डॉक्टरों, नर्सों और स्वास्थ्यकर्मियों को भी इन नई तकनीकों का प्रशिक्षण देना जरूरी है। यदि सिर्फ बड़ी प्राइवेट लैब, शहरों के अस्पताल या कुछ चुने हुए क्लीनिक इन सुविधाओं का फायदा उठाएंगे, तो बाकी समाज पीछे छूट जाएगा।

अब जरुरत है कि बीमारी की खबर आने से पहले लोग खुद ही स्वास्थ्य जांच की पहल करें। स्कूलों, पंचायत और मॉडर्न हेल्थ सेंटरों में शुरुआती स्क्रीनिंग अभियान चलें। आम आदमी को बताना जरूरी है कि छोटी-छोटी आदतों (स्वस्थ भोजन, व्यायाम, पर्याप्त नींद, तनाव प्रबंधन) से बड़ी समस्याओं से बचा जा सकता है। सरकार और समाज, दोनों को मिलकर चिकित्सा की ‘रोकथाम संस्कृति’ को गाँव-गाँव, गली-गली तक पहुँचाना होगा।

जहाँ जेनेटिक टेस्ट, पर्सनलाइज्ड प्रोटोकॉल और स्मार्ट हेल्थ डिवाइसेज़ की पहुँच सीमित है, वहीं जीवनशैली, खानपान, और परम्परागत योग या ध्यान जैसी भारतीय दृष्टियों को भी इस अभियान का हिस्सा बनाना चाहिए। संचार, स्वास्थ्य शिक्षा, और सुरक्षा को केंद्र में रखकर प्रिवेंटिव मेडिसिन का नया मॉडल गढ़ा जा सकता है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button