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भारत का गहराता ऊर्जा संकट: युद्ध, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और रसोई के बजट पर चौतरफा मार

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार की राजनीति: 'प्राइस वॉर'

2026 की शुरुआत के साथ ही भारत के हर घर में एक नई और चिंताजनक चर्चा शुरू हो गई है “गैस संकट”। यह केवल दो शब्दों का मुहावरा नहीं है, बल्कि एक कड़वी हकीकत है जो एलपीजी (LPG) सिलेंडर की किल्लत, पीएनजी (PNG) की आपूर्ति में अनिश्चितता और लगातार बढ़ती कीमतों के रूप में सामने आ रही है। इस संकट की जड़ें दूर दराज के देशों में चल रहे युद्ध और भू-राजनीतिक अस्थिरता में गहरे तक धंसी हुई हैं।

वर्तमान में भारत के प्रमुख महानगरों और ग्रामीण इलाकों से एलपीजी रिफिल की बुकिंग में होने वाली देरी की खबरें आ रही हैं। जहाँ पहले सिलेंडर 24 से 48 घंटों में मिल जाता था, अब उसके लिए 7 से 10 दिनों का इंतजार करना पड़ रहा है। वितरकों का कहना है कि बॉटलिंग प्लांट से आपूर्ति (Supply) धीमी हो गई है। शहरी क्षेत्रों में, जहाँ पाइप से गैस आती है, उपभोक्ताओं ने कम दबाव (Low Pressure) की शिकायत की है, जिससे खाना पकाने में अधिक समय लग रहा है। पिछले तीन महीनों में घरेलू गैस सिलेंडर की कीमतों में ₹150 से ₹200 तक की वृद्धि देखी गई है, जिससे मध्यम और निम्न आय वर्ग का बजट पूरी तरह चरमरा गया है।

भारत अपनी गैस जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा (लगभग 55% एलपीजी और 50% एलएनजी) आयात करता है। वर्तमान में पश्चिम एशिया (West Asia) और पूर्वी यूरोप में चल रहे संघर्षों ने इस आयात तंत्र को बुरी तरह प्रभावित किया है। लाल सागर (Red Sea) और स्वेज नहर जैसे महत्वपूर्ण जलमार्ग अब सुरक्षित नहीं रहे। युद्ध के कारण टैंकरों को अफ्रीका के ‘केप ऑफ गुड होप’ का लंबा चक्कर लगाकर भारत आना पड़ रहा है। इससे न केवल समय बढ़ गया है, बल्कि जहाजों का किराया (Freight Cost) भी दोगुना हो गया है।

युद्धग्रस्त क्षेत्रों से गुजरने वाले जहाजों का बीमा प्रीमियम आसमान छू रहा है। तेल कंपनियों के लिए यह अतिरिक्त लागत अंततः ग्राहकों की जेब पर पड़ती है। गैस पाइपलाइनों और महत्वपूर्ण टर्मिनलों पर हमलों ने वैश्विक गैस बाजार में ‘पैनिक बाइंग’ (Panic Buying) की स्थिति पैदा कर दी है, जिससे कीमतें स्थिर नहीं हो पा रही हैं।

युद्ध के दौरान गैस केवल ईंधन नहीं, बल्कि एक ‘हथियार’ बन जाती है। चूंकि यूरोप ने रूसी गैस पर निर्भरता कम की है, वह अब उसी अंतरराष्ट्रीय बाजार से एलएनजी (LNG) खरीद रहा है जहाँ से भारत खरीदता है। यूरोप की ऊंची भुगतान क्षमता के कारण गैस टैंकर वहां मुड़ रहे हैं, जिससे भारत जैसे देशों के लिए ‘स्पॉट मार्केट’ में गैस कम पड़ रही है। वैश्विक अनिश्चितता के बीच डॉलर मजबूत हो रहा है, जिससे भारत के लिए गैस आयात करना और भी महंगा होता जा रहा है क्योंकि भुगतान डॉलर में करना पड़ता है।

संकट केवल बाहर से नहीं है, कुछ आंतरिक कारक भी इसे बढ़ा रहे हैं भारत की कुछ प्रमुख रिफाइनरियां वर्तमान में तकनीकी अपग्रेडेशन या रखरखाव (Maintenance) के दौर से गुजर रही हैं, जिससे घरेलू एलपीजी उत्पादन में अस्थायी कमी आई है। किल्लत की खबरों के बीच कुछ डीलर्स और व्यावसायिक उपयोगकर्ता (होटल/रेस्टोरेंट) गैस सिलेंडरों का अवैध भंडारण कर रहे हैं, जिससे आम घरेलू उपभोक्ताओं को परेशानी हो रही है।

गैस संकट का असर बहुआयामी है जब गैस महंगी होती है, तो बाहर खाना खाना और पैक किया हुआ भोजन भी महंगा हो जाता है। मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए बचत करना कठिन हो गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में जहाँ सरकार ने ‘उज्ज्वला’ के तहत कनेक्शन दिए थे, वहां महिलाएं फिर से लकड़ी और उपले (Biomass) की ओर लौट रही हैं क्योंकि वे ₹1100-₹1200 का सिलेंडर वहन नहीं कर सकतीं। यह पर्यावरण और स्वास्थ्य दोनों के लिए घातक है।

सरकार इस बहुआयामी संकट से निपटने के लिए “थ्री-पिलर” (Three Pillar) रणनीति पर काम कर रही है भारत अब केवल कतर या सऊदी अरब पर निर्भर नहीं है। हम अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और अब रूस से भी लंबी अवधि के एलएनजी सौदे कर रहे हैं ताकि आपूर्ति में निरंतरता बनी रहे। तेल की तरह अब गैस के लिए भी रणनीतिक भंडारण केंद्र बनाने की योजना पर काम चल रहा है, ताकि युद्ध जैसी स्थितियों में कम से कम 30 से 45 दिनों का बैकअप देश के पास हो।

कंप्रेस्ड बायो-गैस (CBG) के उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है। कृषि कचरे से गैस बनाकर उसे घरेलू आपूर्ति से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। सरकार ‘गो इलेक्ट्रिक’ अभियान के माध्यम से इंडक्शन कुकटॉप्स को बढ़ावा दे रही है ताकि गैस पर निर्भरता पूरी तरह खत्म की जा सके।

गैस संकट हमें चेतावनी दे रहा है कि जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) पर निर्भरता जोखिम भरी है। भारत को अपनी ‘ऊर्जा टोकरी’ (Energy Basket) में बदलाव की जरूरत है। कृष्णा-गोदावरी (KG) बेसिन में रिलायंस और ओएनजीसी जैसी कंपनियों को उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। ‘वन नेशन, वन गैस ग्रिड’ परियोजना को जल्द पूरा करना होगा ताकि देश के हर हिस्से में गैस समान रूप से पहुँच सके।

“गैस संकट” केवल युद्ध की देन नहीं है, बल्कि यह हमारे ऊर्जा प्रबंधन के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ है। जब तक अंतरराष्ट्रीय सीमाएं अशांत हैं, ऊर्जा की कीमतें अस्थिर रहेंगी। भारत के लिए समाधान केवल आयात में नहीं, बल्कि घरेलू स्रोतों के विकास और सौर ऊर्जा आधारित रसोई (Solar Cooking) जैसे नवाचारों में छिपा है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि युद्ध की आंच गरीब की रसोई तक न पहुँचे, क्योंकि ईंधन केवल सुविधा नहीं, बल्कि एक बुनियादी आवश्यकता है।

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