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पश्चिम एशिया का महासंकट और भारत की ऊर्जा ढाल: 2026 के वैश्विक संघर्ष के बीच आत्मनिर्भरता और कूटनीति का विश्लेषण

घरेलू मोर्चे पर 'सर्जिकल स्ट्राइक': जमाखोरी और कालाबाजारी का अंत

मार्च 2026 में जब पश्चिम एशिया (Middle East) के रेगिस्तान बारूद की गंध से भर गए और दुनिया की सबसे संवेदनशील समुद्री नस, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz), युद्ध का अखाड़ा बन गई, तब भारत के सामने एक अस्तित्वगत चुनौती खड़ी थी। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों, विशेष रूप से एलपीजी (LPG) और कच्चे तेल के लिए, 60% से अधिक इसी क्षेत्र पर निर्भर है।

तनाव इतना गहरा था कि वैश्विक विशेषज्ञों ने भारत में ईंधन की भारी किल्लत और आर्थिक मंदी की भविष्यवाणी कर दी थी। लेकिन, भारत सरकार ने एक बहुआयामी रणनीति जिसमें सैन्य पराक्रम, कूटनीतिक चतुरता और घरेलू कठोरता शामिल थी के जरिए इस संकट को न केवल संभाला, बल्कि अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक नया ‘ब्लूप्रिंट’ भी तैयार किया।

जब ईरान और अमेरिका के बीच तनाव चरम पर पहुँचा, तो होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यापारिक जहाजों पर हमले आम हो गए। भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने एलपीजी टैंकरों को सुरक्षित घर लाना था। 20 मार्च 2026 तक, भारत ने ‘जग वसंत’ (Jag Vasant), ‘पाइन गैस’ (Pine Gas) और ‘एमटी नंदा देवी’ जैसे विशाल टैंकरों को युद्ध क्षेत्र से सुरक्षित बाहर निकाला। यह केवल संयोग नहीं था, बल्कि भारतीय नौसेना और विदेश मंत्रालय के बीच सटीक समन्वय का परिणाम था।

भारतीय नौसेना के विध्वंसक (Destroyers) और फ्रिगेट जहाजों ने इन टैंकरों को ‘कवर’ प्रदान किया। ‘ऑपरेशन संकल्प’ के तहत, भारतीय युद्धपोतों ने न केवल समुद्री लुटेरों बल्कि ड्रोन और मिसाइल हमलों के खतरों से भी इन जहाजों की रक्षा की। भारत ने तेहरान और वाशिंगटन दोनों के साथ अपने अच्छे संबंधों का उपयोग किया। यह सुनिश्चित किया गया कि भारतीय ध्वज वाले जहाजों को ‘तटस्थ’ (Neutral) माना जाए, जिससे आपूर्ति श्रृंखला में कम से कम व्यवधान आए।

जैसे ही युद्ध की खबरें फैलीं, भारत के भीतर एलपीजी की कमी की अफवाहें उड़ने लगीं। कुछ असामाजिक तत्वों ने सिलेंडरों की जमाखोरी शुरू कर दी, जिससे कृत्रिम किल्लत पैदा होने लगी। पेट्रोलियम मंत्रालय ने राज्य सरकारों के साथ मिलकर एक बड़ा अभियान चलाया। मार्च के तीसरे सप्ताह तक 12,000 से अधिक ठिकानों पर छापेमारी की गई।

सरकार ने ‘आवश्यक वस्तु अधिनियम’ (Essential Commodities Act) के तहत 640 से अधिक एफआईआर दर्ज कीं। जमाखोरों को संदेश दिया गया कि संकट के समय लाभखोरी को ‘देशद्रोह’ के समान माना जाएगा। गैस कंपनियों के सॉफ्टवेयर में बदलाव किया गया ताकि एक निश्चित अंतराल से पहले दोबारा बुकिंग न हो सके। इससे उन लोगों पर लगाम लगी जो डर के मारे 3-4 सिलेंडर एडवांस में भरना चाहते थे।

भारत ने महसूस किया कि केवल खाड़ी देशों पर निर्भर रहना जोखिम भरा है। इसलिए, ‘ऊर्जा टोकरी’ (Energy Basket) को बदलने की प्रक्रिया तेज की गई। भारत ने अर्जेंटीना से एलपीजी आयात को रातों-रात दोगुना कर दिया। इसके अलावा, अमेरिका के साथ 2.2 मिलियन मीट्रिक टन के दीर्घकालिक समझौते को सक्रिय किया गया, जो ‘केप ऑफ गुड होप’ मार्ग से भारत पहुँच रहा है। पहली बार भारत ने कनाडा से शेल गैस (Shale Gas) के बड़े कार्गो मंगाए। यह विविधीकरण ईरान और खाड़ी देशों के ‘ब्लैकमेल’ या युद्ध की स्थिति में भारत को एक ‘सुरक्षा कवच’ प्रदान करता है।

व्यावसायिक उपयोगकर्ताओं (होटल, रेस्टोरेंट और मॉल) को एलपीजी सिलेंडर से हटाकर पाइप वाली प्राकृतिक गैस (PNG) पर शिफ्ट करना सरकार की प्राथमिकता बन गई। जैसा कि केरल में देखा गया, होटलों को पीएनजी अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया ताकि घरेलू उपयोग के लिए एलपीजी सिलेंडर बच सकें। आईजीएल (IGL) और गेल (GAIL) जैसी कंपनियों को युद्ध स्तर पर नई पाइपलाइन बिछाने के लिए अतिरिक्त फंड दिया गया। सरकार ने ‘कनेक्शन ऑन डिमांड’ योजना शुरू की, जहाँ व्यावसायिक उपयोगकर्ता 48 घंटे के भीतर पीएनजी कनेक्शन प्राप्त कर सकते हैं।

प्राकृतिक गैस की कमी का सीधा असर यूरिया और उर्वरक उत्पादन पर पड़ता है। भारत एक कृषि प्रधान देश है, और उर्वरकों की कमी खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती थी। सरकार ने नैनो-यूरिया के उपयोग को बढ़ावा दिया, जिसे गैस की कम आवश्यकता होती है। किसानों को सलाह दी गई कि वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महंगे और दुर्लभ आयातित उर्वरकों के बजाय स्वदेशी विकल्पों का उपयोग करें।संकट के दौरान, बिजली संयंत्रों के बजाय उर्वरक कारखानों को गैस की आपूर्ति में प्राथमिकता दी गई।

इस संकट ने भारत को अपने एलपीजी और कच्चे तेल के ‘सामरिक भंडार’ को और बड़ा करने की सीख दी है। सरकार ने कर्नाटक और ओडिशा में नए भूमिगत भंडारण केंद्रों (Underground Caverns) के निर्माण को गति दी है। लक्ष्य यह है कि भविष्य में किसी भी युद्ध की स्थिति में भारत के पास कम से कम 90 दिनों का बफर स्टॉक उपलब्ध हो। पश्चिम एशिया का यह युद्ध भारत के ‘एनर्जी ट्रांजिशन’ के लिए उत्प्रेरक (Catalyst) बन गया है। इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) और ग्रीन हाइड्रोजन के लिए मिलने वाली सब्सिडी में 30% की वृद्धि की गई है ताकि पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्भरता कम हो सके।

2026 का पश्चिम एशिया संकट भारत के लिए एक परीक्षा की घड़ी थी। अपनी सैन्य शक्ति का विवेकपूर्ण उपयोग करके, जमाखोरों के खिलाफ कठोरता दिखाकर और आयात के नए रास्ते खोलकर, भारत ने यह साबित कर दिया है कि वह अब एक ‘मजबूर खरीदार’ नहीं, बल्कि एक ‘मजबूत रणनीतिक खिलाड़ी’ है।

भारत की सफलता इस बात में निहित है कि यहाँ के आम आदमी को युद्ध की आंच महसूस नहीं होने दी गई। ‘प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना’ के करोड़ों लाभार्थियों तक गैस पहुँचती रही, और उद्योग चलते रहे। यह संकट भविष्य के ‘आत्मनिर्भर भारत’ की नींव को और मजबूत कर गया है, जहाँ हमारी ऊर्जा की चाबी किसी एक क्षेत्र के पास नहीं होगी।

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