क्रिकेटसंपादकीय

क्रिकेट की पिच पर राजनीति की गेंद

 

भारत में क्रिकेट केवल एक खेल नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक धड़कन है। जिस तरह राजनीति आम जनता के जीवन और भविष्य को प्रभावित करती है, उसी तरह क्रिकेट भी लोगों की भावनाओं और सामूहिक चेतना को आकार देता है। इसलिए जब ये दोनों क्षेत्र आपस में जुड़ते हैं, तो उसका असर सिर्फ खेल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज और राष्ट्र की दिशा तक पहुँच जाता है। हाल के वर्षों—ख़ासकर 2023 के वनडे वर्ल्ड कप और हाल ही में एशिया कप विवाद ने यह स्पष्ट कर दिया कि क्रिकेट और राजनीति अब दो अलग ध्रुव नहीं, बल्कि एक ही सिक्के के दो पहलू बन चुके हैं।

राजनीति का क्रिकेट पर प्रभाव

  • सबसे पहले प्रशासनिक ढांचे पर नज़र डालें। #BCCI दुनिया का सबसे अमीर खेल संगठन, लंबे समय से राजनीतिक प्रभाव में रहा है।
  • कुछ समय पहले तक जय शाह इसके सचिव रहे हैं जो केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के पुत्र हैं
  • अतीत में शरद पवार, अरुण जेटली, जगमोहन डालमिया जैसे नेताओं ने भी बोर्ड पर अपना वर्चस्व कायम किया।
  • स्टेडियमों के नामकरण से लेकर टिकट वितरण तक राजनीतिक हस्तक्षेप साफ़ झलकता है।
  • राजनीति का असर केवल बोर्ड तक सीमित नहीं है। खिलाड़ी भी सक्रिय राजनीति में उतरते रहे हैं। वर्तमान में टीम इंडिया के कोच गौतम गंभीर पिछली लोकसभा में बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़कर संसद पहुंचे, नवजोत सिंह सिद्धू कांग्रेस और फिर आम आदमी पार्टी से जुड़े, मोहम्मद अजहरूद्दीन कांग्रेस सांसद रहे। इनकी लोकप्रियता को वोट में बदलना दलों की रणनीति का हिस्सा है।

राजनीति का सकारात्मक और नकारात्मक चेहरा- यह कहना उचित नहीं होगा कि राजनीति का प्रभाव केवल नकारात्मक रहा है।

सकारात्मक पक्ष: नरेंद्र मोदी स्टेडियम जैसे आधुनिक ढांचे, विमेंस प्रीमियर लीग (WPL) की शुरुआत, खिलाड़ियों को सरकारी पुरस्कार और नौकरी राजनीति की इच्छाशक्ति से ही संभव हुए।

नकारात्मक पक्ष: चयन प्रक्रिया में पक्षपात के आरोप, आईपीएल फिक्सिंग कांड, एशिया कप 2023 में ट्रॉफी वितरण विवाद, वर्ल्ड कप टिकट घोटाले—ये सब दिखाते हैं कि राजनीति अक्सर खेल की आत्मा को चोट पहुँचाती है।

  • पिछले रविवार ही दुबई में संपन्न हुए एशिया कप 2025 में भी राजनीती हावी रही, पहलगाम आतंकी हमले और फिर भारत के #OperationSindoor के तहत किये गए जवाबी कार्रवाई की छाप सीरीज में खेले गए भारत-पकिस्तान मैचों पर भी साफ़ दिखी। मैच के दौरान जहाँ दोनों देशों  के खिलाडियों में हाथ मिलाने की सामान्य सी रिवायत का पालन नहीं किया तो वही पाकिस्तानी खिलाड़ी अपने व्यवहार से भारतीय खिलाडियों को उकसाते नज़र आए। इतना ही नहीं #AsiaCup जीतने के बाद हुई प्रेजेंटेशन सेरेमनी में जब भारतीय खिलाड़ियों ने पीसीबी के चेयरमेन मोहसिन नक़वी के हाथों विजेता ट्रॉफी लेने से इनकार किया तो झुंझलाहट में मोहसिन नक़वी ट्रॉफी अपने साथ लेकर चले गए और विजेता ट्रॉफी भारतीय टीम को नहीं मिली.

क्रिकेट का राजनीति पर प्रभाव

  • क्रिकेट केवल राजनीति से प्रभावित नहीं होता, बल्कि राजनीति को भी प्रभावित करता है।
  • जब भारत वर्ल्ड कप 2023 के फाइनल तक पहुँचा, तो सत्तारूढ़ दल ने इसे “भारत की क्षमता और नेतृत्व” से जोड़ने की कोशिश की।
  • चुनावी रैलियों और प्रचार में क्रिकेटरों की मौजूदगी को जनता आकर्षण के रूप में देखती है।
  • भारत-पाक मैच तो हमेशा से “क्रिकेट डिप्लोमेसी” का हिस्सा रहे हैं। 2023 एशिया कप और वर्ल्ड कप में पाकिस्तान का भारत आना और मैचों का आयोजन इस डिप्लोमेसी का ताज़ा उदाहरण है।

 मीडिया और जनता की भूमिका

  • मीडिया ने क्रिकेट और राजनीति के रिश्ते को और गहरा किया है।
  • जीत को राष्ट्रीय गर्व और हार को राजनीतिक असफलता से जोड़ दिया जाता है।
  • सोशल मीडिया पर #BoycottPakistan जैसे हैशटैग राजनीतिक रंग लेते हैं।
  • अरबों के प्रसारण अधिकारों में कॉरपोरेट और राजनीतिक गठजोड़ का प्रभाव भी सामने आता है।
  • लेकिन यही मीडिया महिला क्रिकेट को लोकप्रिय बनाने और खिलाड़ियों को हीरो बनाने में भी अहम भूमिका निभाता है।

निष्कर्ष

  • क्रिकेट और राजनीति का रिश्ता भारतीय समाज की जटिलता को दर्शाता है। एक ओर यह रिश्ता खेल को संसाधन, पहचान और वैश्विक मंच देता है; दूसरी ओर यह भ्रष्टाचार, पक्षपात और प्रचार का औजार भी बन जाता है।
  • जरूरी यह है कि इस रिश्ते को संतुलित और पारदर्शी बनाया जाए। राजनीति को खेल की आत्मा से खिलवाड़ नहीं करना चाहिए, और क्रिकेट को केवल सत्ता पक्ष के एजेंडे का प्रचार- प्रसार का माध्यम नहीं बनना चाहिए। यदि दोनों क्षेत्र ईमानदारी और राष्ट्रहित की भावना से जुड़ें, तो भारत न केवल लोकतंत्र बल्कि खेल संस्कृति में भी विश्व का नेतृत्व कर सकता है.

 

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