तंबाकू-मुक्त भविष्य: स्कूलों से शुरू होती सकारात्मक क्रांति
कहानी केवल कानून की नहीं, समाज और स्कूलों की

क्या आप इस बात से हैरान हैं कि तंबाकू एक ज़हरीला जाल बच्चों और किशोरों तक इतनी आसानी से पहुंच जाता है? भारत में साल 2025 में “तंबाकू फ्री यूथ कैंपेन 3.0” की शुरुआत यही बताती है कि अब बदलाव केवल कानूनों या नियमों से नहीं, बल्कि स्कूलों और बच्चों की सोच से होगा। अगर हमे तंबाकू की आदत को जड़ से मिटाना है, तो इसकी लड़ाई उन कक्षाओं, गलियारों और खेल के मैदानों से शुरू करनी होगी, जहां हमारा भविष्य पलता है।
भारत में करोड़ों बच्चे, हर सुबह स्कूल जाते हैं। वे वहीं से सिर्फ गणित या विज्ञान नहीं, अपनी रोज़ की जिंदगी और आदतें भी सीखते हैं। पर समस्या यह है कि स्कूल के आस-पास तंबाकू उत्पादों की खुलेआम बिक्री होती है। बहुत बार, दस या बारह साल के बच्चे केवल दोस्तों के बहकावे में तंबाकू चख लेते हैं। यही छोटा सा शौक कई बार पूरी जिंदगी के लिए बड़ा अभिशाप बन जाता है।
इसलिए जब सरकार और समाज ने यह मुहिम शुरू की तो उन्होंने स्कूलों को बदलाव का सबसे बड़ा मंच चुना। स्कूल न सिर्फ बच्चों की शिक्षा, बल्कि चरित्र और संस्कार का केंद्र हैं। बदलाव वहीं से संभव है जब हर बच्चा तंबाकू के खिलाफ फैसला ख़ुद ले।
यह अभियान सिर्फ एक और सरकारी कार्यक्रम नहीं है, बल्कि एक संवाद है बच्चों से, अभिभावकों से, शिक्षक और समाज से। अब सिर्फ घोषणाएं नहीं, बल्कि स्कूल कैंपस में वास्तविक प्रतियोगिताएं, पोस्टर, क्विज, स्वरचित नाटक, शपथग्रहण और खुले विमर्श से हर बच्चे को जोड़ा जा रहा है।
दो महीनों तक हर स्कूल, पठन–पाठन के साथ स्वस्थ जीवन की बातें, नयी सोच के साथ अपनी भूमिका को निभाने की चुनौती ले रहा है।
जो स्कूल पूरी तरह तंबाकू मुक्त हो जाएंगे, उन्हें प्रमाणपत्र और राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिलेगी। यह बच्चों के लिए अपने भविष्य को बचाने और दूसरों को भी प्रेरित करने का अद्भुत मौका है।
अगर आप सोचते हैं कि यह बहुत आसान है, तो रुकिए। स्कूल के नजदीक तंबाकू बेचने वाली दुकानों पर निगरानी जरूरी है। अभी भी सैकड़ों स्कूल ऐसे हैं जो ‘तंबाकू मुक्त’ बनने की शर्तों पर खरे नहीं उतरते। गांव-देहात और छोटे कस्बों में जागरूकता की कमी है, शिक्षक स्वयं प्रशिक्षित नहीं हैं या नियमों की सख्ती से पालन नहीं करते। अभिभावकों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी, क्योंकि बच्चे घर से जितना सीखते हैं, उतना स्कूल से नहीं।
पिछले अभियान में ऐसे अनगिनत उदाहरण सामने आए कई स्कूलों के बच्चों ने पोस्टर बनाए, नुक्कड़ नाटक किए, और पूरे गांव को तंबाकू छोड़ने के लिए प्रेरित किया। एक छात्रा ने अपने पिता को तंबाकू छोड़ने के लिए संकल्प दिलाया; कई बच्चों ने अपने बड़े भाई–बहनों को जागरूक किया। शिक्षकों ने ‘स्वस्थ जीवन’ का संदेश देने के लिए खुद भी तंबाकू से तौबा की। यह बदलाव किताब से नहीं, बच्चों के दिल से आया। जब किसी स्कूल में तंबाकू का सेवन पूरी तरह बंद होता है, तब केवल एक नियम नहीं, पूरी पीढ़ी सकारात्मक बन जाती है।
यह़ अभियान एक चलती प्रक्रिया है स्कूलों में हेल्थ एजुकेशन को व्हाइट बोर्ड से बाहर, आम बात बनाया जाए। नयी सोच के साथ पाठ्यक्रम में तंबाकू विरोधी संदेश, नुक्कड़ नाटक, पोस्टर, और प्रतियोगिता को जगह दी जाए। गांवों और कस्बों के स्कूल भी शहरों की तरह जागरूक बनें; सरकार और स्थानीय प्रशासन नियमित फॉलो–अप करें। बच्चों के बीच तंबाकू या सिगरेट की मार्केटिंग, सोशल मीडिया पर दिखने वाले विज्ञापन या भ्रामक प्रचार का प्रतिरोध बढ़ाया जाए।
तंबाकू मुक्त समाज का सपना कानून या घोषणाओं से नहीं, बच्चों की जागरूकता, समुदाय के अभियान और स्कूली परंपरा से फलीभूत होता है। स्कूल केवल वैज्ञानिक पढ़ाई नहीं कराते वह जीने की दिशा भी देते हैं। जब हर बच्चा शपथ ले, “मैं तंबाकू से दूर रहूंगा”, तो यह अभियान केवल स्कूल की दीवारों तक सीमित नहीं रहता, उस बच्चे के परिवार, मोहल्ले, गाँव–शहर–देश तक पहुँच जाता है।अब समय है कि स्कूल हर बच्चे में स्वस्थ विकल्प, साहस और नई सोच की मशाल जलाएँ ताकि आनेवाली पीढ़ी तंबाकू की काली छाया से दूर, एक उमंग भरा जीवन जी सके।



