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डिजिटल न्याय का नया क्षितिज: कंटेंट रचनाकारों और बिग-टेक के बीच राजस्व संतुलन

'वैल्यू गैप' (Value Gap) का संकट: मेहनत किसी की, मुनाफा किसी का

सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए ‘राजस्व साझाकरण’ (Revenue Sharing) के एक न्यायसंगत और पारदर्शी मॉडल की आवश्यकता पर दिया गया बयान डिजिटल अर्थव्यवस्था के लोकतंत्रीकरण की दिशा में एक क्रांतिकारी प्रस्थान बिंदु है। मंत्री का यह स्पष्ट संदेश कि गूगल, मेटा (फेसबुक/इंस्टाग्राम) और एक्स (पूर्व में ट्विटर) जैसे प्लेटफॉर्म्स को उन लोगों के साथ अपनी कमाई साझा करनी चाहिए जो वास्तव में सामग्री (Content) का सृजन करते हैं, भारत की ‘डिजिटल संप्रभुता’ और ‘आर्थिक न्याय’ की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। 2026 के इस दौर में, जहाँ डेटा को ‘नया तेल’ और कंटेंट को ‘नई मुद्रा’ माना जा रहा है, वहां इस बहस का केंद्र में आना अनिवार्य था।

आज हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ सूचना का उपभोग पारंपरिक टीवी या अखबारों के बजाय स्मार्टफोन की स्क्रीन पर अधिक हो रहा है। लेकिन इस डिजिटल बदलाव ने एक गहरा आर्थिक संकट भी पैदा कर दिया है। सामग्री बनाने वाले (पत्रकार, कलाकार, शिक्षक) मेहनत करते हैं, निवेश करते हैं और शोध करते हैं, लेकिन उस सामग्री के प्रदर्शन से होने वाले विज्ञापनों के राजस्व का शेर-हिस्सा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स अपनी जेब में डाल लेते हैं।

डिजिटल मीडिया पारिस्थितिकी तंत्र में वर्तमान में एक बड़ी विसंगति है, जिसे विशेषज्ञ ‘वैल्यू गैप’ कहते हैं। एक समाचार संगठन रिपोर्टरों को तैनात करता है, कानूनी जोखिम उठाता है और खबर जुटाने के लिए भारी बुनियादी ढांचे पर खर्च करता है। जब यही खबर फेसबुक या गूगल पर शेयर होती है, तो वे प्लेटफॉर्म्स यूजर को अपनी साइट पर बनाए रखने के लिए उस खबर का उपयोग करते हैं, लेकिन बदले में समाचार संगठन को उस ट्रैफिक से होने वाली कमाई का नगण्य हिस्सा ही मिलता है।

मंत्री वैष्णव ने विशेष रूप से प्रोफेसरों, शोधकर्ताओं और विशेषज्ञों का उल्लेख किया। जब एक प्रोफेसर अपना जटिल शोध या ज्ञान यूट्यूब या अन्य प्लेटफॉर्म पर साझा करता है, तो वह प्लेटफॉर्म के लिए ‘बौद्धिक मूल्य’ (Intellectual Value) बनाता है। बिना इस सामग्री के, ये प्लेटफॉर्म केवल खाली फ्रेम (Empty Frames) बनकर रह जाएंगे।

अश्विनी वैष्णव ने “सिद्धांत को सही करने” (Set the Principle Right) की बात कही है। इसके तीन मुख्य आधार हैं यदि कंटेंट बनाने वालों को उचित पैसा नहीं मिलेगा, तो अच्छी पत्रकारिता और उच्च गुणवत्ता वाला शैक्षणिक कंटेंट खत्म हो जाएगा। यह ‘बाजार की विफलता’ (Market Failure) की स्थिति होगी।

दूरदराज के इलाकों में काम करने वाले स्वतंत्र इन्फ्लुएंसर्स और भाषाई पत्रकारों को यदि विज्ञापन राजस्व में हिस्सा मिलता है, तो यह ‘डिजिटल इंडिया’ के तहत ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा देगा। वर्तमान में विज्ञापन बाजार पर दो या तीन बड़ी कंपनियों का कब्जा है। राजस्व साझाकरण कानून इस एकाधिकार को तोड़कर पैसे को विकेंद्रीकृत करेगा।

भारत इस मामले में अकेला नहीं है। दुनिया के कई विकसित देश ‘बिग-टेक’ कंपनियों को जवाबदेह बना चुके हैं ऑस्ट्रेलिया दुनिया का पहला देश था जिसने कानून बनाया कि गूगल और फेसबुक को समाचार प्रकाशकों के साथ भुगतान के लिए बातचीत करनी होगी। शुरुआत में इन कंपनियों ने विरोध किया (फेसबुक ने तो कुछ समय के लिए खबरें ही ब्लॉक कर दी थीं), लेकिन अंततः उन्हें झुकना पड़ा और अब वे करोड़ों डॉलर स्थानीय मीडिया को दे रहे हैं।

कनाडा ने भी इसी तरह का मॉडल अपनाया है। यूरोपीय संघ (EU) ने भी ‘कॉपीराइट डायरेक्टिव’ के माध्यम से प्रकाशकों के अधिकारों को सुरक्षित किया है। मंत्री वैष्णव का संकेत है कि भारत इन वैश्विक मॉडलों से सीख लेकर एक ऐसा ‘भारतीय मॉडल’ विकसित करेगा जो न केवल बड़े मीडिया घरानों बल्कि छोटे ‘नैनो-इन्फ्लुएंसर्स’ और शोधकर्ताओं के हितों की भी रक्षा करेगा।

राजस्व साझाकरण की सबसे बड़ी चुनौती ‘एल्गोरिदम’ की अपारदर्शिता है। सोशल मीडिया कंपनियां यह सार्वजनिक नहीं करतीं कि वे किस कंटेंट को प्रमोट करती हैं और विज्ञापनों का मूल्य कैसे तय होता है। मंत्री वैष्णव के प्रस्ताव का एक हिस्सा यह भी हो सकता है कि इन कंपनियों को अपने राजस्व डेटा का स्वतंत्र ऑडिट कराना पड़े ताकि यह पता चल सके कि किस कंटेंट से उन्होंने कितना कमाया है। यह पहली बार है जब किसी भारतीय मंत्री ने स्पष्ट रूप से ‘अकादमिक कंटेंट’ को राजस्व के दायरे में लाने की बात की है। यह एड-टेक (Ed-Tech) और स्वतंत्र शिक्षाविदों के लिए एक बड़ी राहत हो सकती है।

निश्चित रूप से, वैश्विक डिजिटल दिग्गज इस बदलाव का विरोध करेंगे। उनकी संभावित दलीलें हो सकती हैं कंपनियां कह सकती हैं कि वे प्रकाशकों को ‘फ्री ट्रैफिक’ भेज रही हैं, जिससे उन्हें फायदा होता है। वे इसे डिजिटल नवाचार पर एक ‘टैक्स’ की तरह पेश कर सकते हैं। छोटे प्लेटफॉर्म्स कह सकते हैं कि राजस्व साझाकरण की जटिल गणना उनके लिए बोझिल होगी। हालांकि, भारत सरकार का रुख स्पष्ट है यदि आप भारतीय नागरिकों द्वारा बनाई गई सामग्री से भारतीय बाजार में पैसा कमा रहे हैं, तो आपको उस लाभ का उचित हिस्सा स्थानीय रचनाकारों को वापस देना होगा।

अश्विनी वैष्णव का यह कदम ‘न्यू इंडिया’ के डिजिटल विजन का हिस्सा है। एक ऐसा तंत्र जहाँ एक गांव का इन्फ्लुएंसर, एक शहर का प्रोफेसर और एक राष्ट्रीय समाचार पत्र सभी को उनके योगदान के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म्स द्वारा सम्मानित और आर्थिक रूप से पुरस्कृत किया जाए।

यह नीति केवल पैसों के बारे में नहीं है; यह ‘सम्मान’ और ‘अधिकार’ के बारे में है। यदि भारत एक न्यायसंगत राजस्व मॉडल स्थापित करने में सफल रहता है, तो यह दुनिया के अन्य विकासशील देशों के लिए एक ‘ब्लूप्रिंट’ (Blueprint) बनेगा। समय आ गया है कि डिजिटल दुनिया के ‘द्वारपाल’ (Gatekeepers) अब ‘साझेदार’ (Partners) बनें।

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