भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौता “90% से अधिक” पूरा: दशकों पुराने व्यापारिक गतिरोध का ऐतिहासिक अंत निकट
अमेरिकी विदेश विभाग ने बताया नया मोड़, मार्को रुबियो के भारत दौरे और आईएमईसी (IMEC) को मिलेगी अभूतपूर्व गति

विश्व के सबसे बड़े और सबसे पुराने लोकतंत्रों भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच सामरिक, आर्थिक और भू-राजनीतिक संबंधों के इतिहास में एक युगांतरकारी अध्याय जुड़ने जा रहा है। दशकों से दोनों देशों के द्विपक्षीय रिश्तों में सबसे जटिल कांटा और अटकाव बिंदु (Sticking Point) रहे व्यापारिक और टैरिफ विवादों को हमेशा के लिए समाप्त करने के उद्देश्य से प्रस्तावित भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौता (US-India Bilateral Trade Agreement – BTA) अब “90 प्रतिशत से अधिक” (90-per-cent-plus) पूरा हो चुका है।
अमेरिकी विदेश विभाग (US State Department) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने समाचार एजेंसी ‘प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया’ (PTI) को दिए एक विशेष साक्षात्कार में इस ऐतिहासिक कूटनीतिक सफलता की पुष्टि करते हुए कहा कि दोनों पक्ष समझौते के “बेहद करीब” हैं और अब केवल कुछ अंतिम तकनीकी व कानूनी औपचारिकताएं सुलझाई जा रही हैं। अमेरिकी अधिकारी के अनुसार, व्यापार के मोर्चे पर यह समझौता दशकों की उस खाई को पाट देगा जिसे दोनों देश पहले कभी पार नहीं कर सके थे। यह समझौता दोनों देशों के संबंधों को “एक बिल्कुल नए और अभूतपूर्व स्तर पर” (Unleash Another Level) ले जाएगा।
यह राजनयिक सफलता ऐसे समय में सामने आई है जब अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो (Marco Rubio) अक्टूबर 2026 में भारत की उच्चस्तरीय यात्रा पर नई दिल्ली पहुंच रहे हैं और इसके तुरंत बाद दिसंबर 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फ्लोरिडा (अमेरिका) में आयोजित होने वाले जी-20 शिखर सम्मेलन (G20 Summit) में भाग लेने के लिए अमेरिका की यात्रा करेंगे। व्यापार समझौते के इस अंतिम चरण में पहुंचने से न केवल क्वाड (Quad) के रणनीतिक गठबंधन को नई मजबूती मिलेगी, बल्कि पश्चिम एशिया के तनाव के कारण थमे इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर (IMEC) को पुनर्जीवित करने में भी मदद मिलेगी।
समाचार एजेंसी पीटीआई (PTI) के साथ बातचीत के दौरान जब अमेरिकी विदेश विभाग के वरिष्ठ अधिकारी से यह सीधा प्रश्न पूछा गया कि भारत और अमेरिका के बीच इस बहुप्रतीक्षित व्यापार समझौते पर अंतिम मुहर कब लगेगी और इसे कब हस्ताक्षरित किया जाएगा, तो अधिकारी ने मुस्कुराते हुए कूटनीतिक और आशावादी लहजे में कहा
“मैं यही कहूंगा ‘स्टे ट्यून्ड’ (Stay Tuned), जैसा कि हम अक्सर कहते रहते हैं। लेकिन इस बार हम सचमुच इसके बहुत, बहुत करीब हैं। यह लगभग 90 प्रतिशत से भी अधिक (90-per-cent-plus) पूरा हो चुका है और इस समय केवल कुछ अंतिम चीजों को ही अंतिम रूप दिया जा रहा है। इसलिए मुझे पूरी उम्मीद है कि आप बहुत जल्द इस पर एक ठोस और ऐतिहासिक घोषणा देखेंगे।
यह समझौता वास्तव में भारत-अमेरिका संबंधों को एक ऐसे अगले स्तर पर ले जाएगा (Unleash Another Level), जिसकी हम पिछले कई दशकों में केवल कल्पना ही कर सकते थे, लेकिन व्यापार के मोर्चे पर वहां तक कभी पहुंच नहीं पाए थे। व्यापार हमेशा से दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी में सबसे बड़ा अटकाव बिंदु (Sticking Point) रहा है। और इसलिए, जब हम इस मुकाम पर पहुंचेंगे, तो यह हम दोनों देशों के लिए बेहद रोमांचक और ऐतिहासिक क्षण होगा।” अमेरिकी अधिकारी के इस बयान ने उन सभी कयासों पर विराम लगा दिया है जो पिछले कुछ महीनों में दोनों देशों के बीच टैरिफ को लेकर चल रही खींचतान के कारण लगाए जा रहे थे।
अमेरिकी विदेश विभाग के बयान से पूर्व भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने भी नई दिल्ली में पब्लिक अफेयर्स फोरम ऑफ इंडिया (PAFI) के 13वें वार्षिक फोरम ‘इंडिया 3.0’ को संबोधित करते हुए भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर अत्यंत निर्णायक और आत्मविश्वास से भरा बयान दिया था
केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने सार्वजनिक रूप से कहा था:
“भारत ने अब तक नौ प्रमुख मुक्त व्यापार समझौते संपन्न किए हैं, जिनमें अमेरिका के साथ प्रस्तावित समझौता भी शामिल है, जो बातचीत के स्तर पर लगभग ‘डन एंड डस्टेड’ (Done and Dusted) है। अब हमारी मुख्य प्राथमिकता अमेरिकी बाजार में हमारे वैश्विक प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले भारत के लिए सही और तुलनात्मक प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त (Comparable Competitive Advantage) तलाशना है, ताकि जैसे ही इस पर हस्ताक्षर हों, हम इसे बिजली की गति से जमीन पर लागू कर सकें।”
गोयल ने जोर देकर कहा कि भारत द्वारा विभिन्न विकसित देशों (जैसे यूएई, ऑस्ट्रेलिया, ईएफटीए और प्रस्तावित अमेरिका-ब्रिटेन सौदे) के साथ किए जा रहे व्यापार समझौतों के माध्यम से भारतीय निर्माताओं और निर्यातकों की पहुंच दुनिया की कुल जीडीपी के 75% से अधिक हिस्से वाले बाजारों तक रियायती और तरजीही शर्तों पर सुनिश्चित हो जाएगी।
भारत और अमेरिका के संबंधों का इतिहास यदि देखा जाए, तो पिछले दो दशकों में दोनों देशों ने रक्षा, अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा और खुफिया सहयोग में अभूतपूर्व प्रगति की है। लेकिन आर्थिक और व्यापारिक क्षेत्र में हमेशा एक ‘असहज संतुलन’ (Uneasy Equilibrium) बना रहा पूर्व अमेरिकी प्रशासन के दौरान भारतीय आयात शुल्कों को लेकर तीखे बयान सामने आए थे और अमेरिका ने भारत को मिलने वाला सामान्यीकृत वरीयता प्रणाली (GSP) का दर्जा वापस ले लिया था।
अमेरिका भारत से अपने आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) कृषि उत्पादों और डेयरी उत्पादों के लिए बाजार खोलने की मांग करता रहा है, जिस पर भारत ने अपनी धार्मिक और घरेलू किसानों की आजीविका की चिंताओं के कारण सख्त रुख अपनाया हुआ था।अमेरिकी फार्मा कंपनियां भारत के कड़े पेटेंट कानूनों (विशेषकर धारा 3(d)) का विरोध करती रही हैं, जो सस्ती जेनेरिक दवाओं के निर्माण की अनुमति देता है।
2026 के वैश्विक परिदृश्य में दोनों देशों को यह अहसास हुआ कि केवल रक्षा समझौतों से भू-राजनीतिक सुरक्षा हासिल नहीं की जा सकती। जब तक दोनों देश सेमीकंडक्टर, सोलर पैनल्स, दुर्लभ खनिजों (Critical Minerals) और सक्रिय दवा सामग्री (API) में चीन पर अपनी निर्भरता कम नहीं करेंगे, तब तक उनकी आर्थिक संप्रभुता सुरक्षित नहीं रह सकती। इसी रणनीतिक अनिवार्यता ने दोनों देशों के वार्ताकारों को अपने दशकों पुराने हठधर्मिता को छोड़कर व्यावहारिक रियायतें देने के लिए प्रेरित किया।
व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने और उस पर उच्चतम स्तर पर राजनीतिक मुहर लगाने के लिए आगामी तीन महीने कूटनीतिक रूप से बेहद व्यस्त रहने वाले हैं अक्टूबर 2026 में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो नई दिल्ली पहुंच रहे हैं। अमेरिकी विदेश विभाग के अधिकारी ने स्पष्ट किया कि रुबियो की यह यात्रा कोई औपचारिक दौरा नहीं है, बल्कि यह व्यापार समझौते से जुड़े उन अंतिम तकनीकी मसलों को सुलझाने और उच्च-तकनीक सहयोग के समझौतों पर हस्ताक्षर करने का अवसर होगी। रुबियो के दौरे के दौरान रक्षा सह-उत्पादन, सेमीकंडक्टर निर्माण संयंत्रों में अमेरिकी निवेश और हरित ऊर्जा प्रौद्योगिकियों के हस्तांतरण पर केंद्रित महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापनों (MoUs) पर हस्ताक्षर किए जाने की योजना है।
दिसंबर 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फ्लोरिडा (अमेरिका) में आयोजित होने वाले जी-20 शिखर सम्मेलन में शिरकत करने जा रहे हैं। कूटनीतिक सूत्रों के अनुसार, यदि अक्टूबर और नवंबर में सभी विधिक औपचारिकताएं पूर्ण हो जाती हैं, तो फ्लोरिडा में दोनों देशों के शीर्ष नेताओं की द्विपक्षीय बैठक के दौरान इस व्यापार समझौते के पहले चरण (Phase-1) का औपचारिक ऐलान किया जाएगा। यह घोषणा दोनों देशों के आर्थिक संबंधों के लिए 21वीं सदी का सबसे बड़ा मील का पत्थर साबित होगी।
इस प्रस्तावित व्यापार समझौते के भू-राजनीतिक परिणाम केवल द्विपक्षीय व्यापार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह पूरे हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) और यूरेशिया के आर्थिक भूगोल को बदलने की क्षमता रखता है अमेरिकी अधिकारी ने विशेष रूप से उल्लेख किया कि क्वाड समूह भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के विदेश मंत्री इस वर्ष तीसरी बार एक साथ औपचारिक बैठक करने जा रहे हैं। अधिकारी ने कहा:
“यह पूरी तरह से अभूतपूर्व है। क्वाड के विदेश मंत्री इतिहास में कभी भी एक ही वर्ष में तीन बार नहीं मिले हैं। यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि वाशिंगटन और नई दिल्ली दोनों इस राजनयिक समूह को कितनी भारी प्राथमिकता दे रहे हैं, और जापान तथा ऑस्ट्रेलिया भी इसे कितना महत्व देते हैं।”
यह व्यापार समझौता क्वाड के बीच ‘ट्रस्ट आर्किटेक्चर’ (Trust Architecture) की रीढ़ बनेगा, जिससे संवेदनशील रक्षा प्रौद्योगिकियों और एआई (AI) हार्डवेयर का आदान-प्रदान आसान हो जाएगा।
सितंबर 2023 में नई दिल्ली जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान घोषित इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर (IMEC) को पिछले दो वर्षों में पश्चिम एशिया में भड़के युद्ध (इज़राइल-गाजा संघर्ष और ईरान से जुड़े सैन्य अभियानों) के कारण गंभीर गतिरोध का सामना करना पड़ा था।
अमेरिकी विदेश विभाग के अधिकारी ने पीटीआई को बताया कि आईएमईसी आज भी अमेरिका और भारत दोनों की शीर्ष प्राथमिकताओं में शामिल है। अधिकारी ने कहा:
“आईएमईसी निश्चित रूप से हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है। भारत और अमेरिका की ओर से हम आगे बढ़ने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में मध्य-पूर्व की घटनाओं चाहे वह इज़राइल/गाजा का संकट हो या ऑपरेशन मिडनाइट हैमर ने चीजों को कुछ समय के लिए धीमा कर दिया था।
जैसे ही मध्य-पूर्व में स्थिति थोड़ी स्थिर होगी, आप आईएमईसी को अत्यधिक तीव्रता से आगे बढ़ते देखेंगे। हम पहले से ही शिपिंग और ट्रकिंग मार्गों के मैपिंग पर काम कर रहे हैं, और सऊदी अरब, जॉर्डन, यूएई तथा इज़राइल भी इस पर समन्वय कर रहे हैं।” व्यापार समझौते के संपन्न होने के कुछ ही महीनों के भीतर अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारतीय बंदरगाहों, कंटेनर टर्मिनलों और समर्पित माल ढुलाई गलियारों (DFC) में अरबों डॉलर के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की घोषणा करने वाली हैं, जो सीधे तौर पर आईएमईसी से जुड़ेंगे।
भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते का 90% से अधिक पूरा होना केवल दो देशों के बीच शुल्कों और आयात-निर्यात के आंकड़ों का समाधान नहीं है, बल्कि यह 21वीं सदी के वैश्विक आर्थिक संतुलन को पुनर्परिभाषित करने वाला ऐतिहासिक घटनाक्रम है।शीतयुद्ध के संकोचों, 1998 के प्रतिबंधों और विगत वर्षों के टैरिफ विवादों को पीछे छोड़ते हुए जब भारत और अमेरिका एक औपचारिक व्यापारिक और आर्थिक साझेदारी में बंधेंगे, तो यह दुनिया के अधिनायकवादी व्यापार मॉडलों के सामने लोकतांत्रिक आपूर्ति श्रृंखला का सबसे सशक्त और अभेद्य विकल्प प्रस्तुत करेगा।
अक्टूबर में मार्को रुबियो के भारत आगमन और दिसंबर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिका दौरे के साथ जब इस समझौते पर अंतिम हस्ताक्षर होंगे, तो यह सचमुच दोनों देशों के संबंधों को उस स्तर पर उन्मुक्त (Unleash Another Level) करेगा, जिसका लाभ दोनों देशों के नागरिकों, उद्योगों और वैश्विक अर्थव्यवस्था को आने वाले कई दशकों तक मिलता रहेगा।



