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डिजिटल इंडिया में सोशल मीडिया एल्गोरिदम और ध्रुवीकरण: क्या हम अपनी ज़मीन खो रहे हैं?

भारत में सोशल मीडिया की खास भूमिका : लोकतंत्र के लिए खतरा

आज जब भारत डिजिटल क्रांति के दौर से गुजर रहा है, सोशल मीडिया हर नागरिक की ज़िंदगी का हिस्सा बन चुका है। पर अब एक चिंता यह उठ रही है कि क्या ये प्लेटफ़ॉर्म हमारे सार्वजनिक संवाद को विविधता से भरने की बजाय सीमित और पक्षपातपूर्ण बना रहे हैं? सोशल मीडिया एल्गोरिदम, जो हमें वैसी ही जानकारी दिखाते हैं जो हमारे विचारों से मेल खाती है, एक “फिल्टर बबल” पैदा करते हैं, जिसकी वजह से समाज में विचारों का फैलाव नहीं बल्कि संकुचन होता है। यही कारण है कि डिजिटल इंडिया में अक्सर ध्रुवीकरण और सामाजिक विभाजन की बातें सुनने को मिलती हैं।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब आदि, एल्गोरिदम का प्रयोग यूजर के हिस्ट्री, पसंद-नापसंद और व्यवहार के आधार पर कंटेंट को क्यूरेट करने के लिए करते हैं। इसका मकसद यूजर की ईंगेजमेंट बढ़ाना होता है, इसलिए वे अक्सर ऐसे कंटेंट को प्राथमिकता देते हैं जो भावुक, विवादास्पद या सशक्त प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है।

इस प्रक्रिया में व्यक्ति को कई बार सही और विविधतापूर्ण जानकारी तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है; वह उन्हीं दृष्टिकोणों के घेरे में फंस जाता है जो उसकी सोच को पुष्ट करते हैं, और विरोधी विचारों से दूर हो जाता है। यह ध्रुवीकरण को बढ़ावा देता है जिससे सामाजिक संवाद में कट्टरता आ जाती है।

भारत के लिए सोशल मीडिया एक महत्वपूर्ण संवाद का मंच है जहाँ करोड़ों लोग अपनी बात रखते हैं, राजनीतिक चर्चा करते हैं, सामाजिक मुद्दों पर बहस करते हैं। फिर भी, अध्ययन बताते हैं कि भारत में भी ये एल्गोरिदम ध्रुवीकरण बढ़ाने में प्रभावी साबित हुए हैं। विशेष रूप से राजनीतिक और धार्मिक विषयों पर विवाद बढ़े हैं। फिल्टर बबल और इको चेंबर्स के कारण आम लोगों के मनोवैज्ञानिक ध्रुवीकरण ने सामाजिक सौहार्द को कमजोर किया है। लोग अपने आप को असहमत पक्ष से अलगा लेते हैं, संवाद की बजाय टकराव को बढ़ावा देते हैं, और लोकतांत्रिक संस्कृति पर प्रभाव पड़ता है।

सोशल मीडिया एल्गोरिदम का यह पक्ष केवल सूचना के बहाव को नहीं बल्कि लोकतांत्रिक स्वस्थ बहस को भी प्रभावित करता है। बिना बहस की विविधता के निर्णय प्रक्रिया कमजोर पड़ती है, एकतरफा सोच जनमत में छा जाती है, और फेक न्यूज या गलत सूचनाएँ तेजी से फैलती हैं। इस डिजिटल ध्रुवीकरण की वजह से सांप्रदायिक तनाव बढ़ा, राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता गहरी हुई, और कई बार हिंसा जैसे नकारात्मक परिणाम भी सामने आये हैं।

सोशल मीडिया कंपनियों को अपने एल्गोरिदम की पारदर्शिता बढ़ानी होगी और आकस्मिक या द्वेषपूर्ण कंटेंट को फैलने से रोकने के उपकरण विकसित करने होंगे। यूजर्स को डिजिटल दुनिया के इन खतरों से अवगत कराना जरूरी है ताकि वे खबरों और विचारों को पारखी नजर से देख सकें। सोशल मीडिया पर विविध विचारों को सम्मानित करने वाले नियम और संस्कृति को बढ़ावा देना होगा।उपयोगकर्ताओं को भी संयम और संवेदनशीलता के साथ ऑनलाइन संवाद करना चाहिए ताकि डिजिटल मध्यमता कायम रहे।

भारत जैसे विशाल लोकतंत्र के लिए सोशल मीडिया लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति का महत्वपूर्ण माध्यम है, परन्तु एल्गोरिदम की वजह से बढ़ता ध्रुवीकरण हमें हमारी मध्यम ज़मीन से दूर कर रहा है। इसे रोकना केवल टेक कंपनियों का दायित्व नहीं, बल्कि सरकार, समाज और हर नागरिक की साझा जिम्मेदारी है। अगर हम डिजिटल संवाद को स्वस्थ बनाना चाहते हैं तो तत्काल मिलकर काम करना होगा। तभी डिजिटल इंडिया अपने लोकतांत्रिक मूल्यों को बनाए रख पाएगा।

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