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भारतीय सड़कों पर नस्लवाद: एंजेल चकमा की मौत और हमारा सामूहिक आत्म-मंथन

सुरक्षा का सवाल: और कितनी बलि?

दिल्ली की व्यस्त सड़कों पर जब उत्तर-पूर्व भारत की एक युवा छात्रा, एंजेल चकमा, अपनी आँखों में ढेर सारे सपने लेकर निकली थी, तो उसने कभी नहीं सोचा होगा कि उसकी शक्ल और उसकी पहचान ही उसकी मौत का कारण बन जाएगी। एंजेल चकमा की मौत सिर्फ एक हादसा नहीं है; यह उस नफरत और भेदभाव का नतीजा है जिसे हम अक्सर ‘मजाक’ कहकर टाल देते हैं।

भारत में हम अक्सर गर्व से कहते हैं कि हम ‘विविधता’ वाले देश हैं। लेकिन हकीकत में, क्या हम वाकई सबको अपना मानते हैं? उत्तर-पूर्व से आए भाई-बहनों को उनके लुक्स, उनके खान-पान या उनकी भाषा के आधार पर चिढ़ाना हमारे समाज में एक आम बात बन गई है। एंजेल के साथ जो हुआ, वह उसी ‘अदृश्य जहर’ का हिस्सा है जिसे हम ‘नस्लवाद’ (Racism) कहते हैं। जब किसी को बार-बार यह महसूस कराया जाता है कि वह ‘अपना’ नहीं है, तो वह इंसान अंदर से टूट जाता है। एंजेल की जान चली गई, लेकिन पीछे छोड़ गई एक ऐसा सवाल जिसका जवाब हम सबको देना है।

बेजबरुआ समिति बनी, कई रिपोर्टें आईं, और निदो तानिया जैसे कई युवाओं की जानें गईं। फिर भी आज सवाल वही खड़ा है—उत्तर-पूर्व के लोग हमारे महानगरों में कब तक डर-डर कर जिएंगे? दिल्ली, मुंबई या बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में रहने वाले उत्तर-पूर्वी छात्र हर दिन किसी न किसी रूप में भेदभाव का सामना करते हैं। कभी उन्हें “चाइनीज़” कहा जाता है, तो कभी उनके कपड़ों पर फब्तियां कसी जाती हैं। क्या सुधार के लिए हमें और भी कई ‘एंजेल’ की मौतों का इंतज़ार करना होगा?

एंजेल चकमा तो चली गई, लेकिन अब हमारी कानूनी व्यवस्था की बारी है। क्या पुलिस इस मामले को पूरी ईमानदारी से सुलझाएगी? क्या उस सोच को सजा मिलेगी जिसने इस हिंसा को जन्म दिया? भारत में अभी तक कोई सख्त ‘नस्लवाद विरोधी कानून’ नहीं है। अक्सर ऐसे मामलों को ‘आपसी झगड़ा’ बताकर फाइलें बंद कर दी जाती हैं। लेकिन यह झगड़ा नहीं, एक नफरत है जिसे जड़ से खत्म करना जरूरी है।

एंजेल चकमा किसी की प्यारी बेटी थी, किसी की बहन थी। वह अरुणाचल या मिजोरम के किसी छोटे से गांव से इस उम्मीद में आई थी कि भारत की राजधानी उसे एक उज्जवल भविष्य देगी। जब हम किसी का अपमान करते हैं, तो हम सिर्फ उसे नहीं, बल्कि उसकी पूरी संस्कृति और आत्मसम्मान को चोट पहुँचाते हैं। उत्तर-पूर्व के लोग इस तिरंगे का उतना ही हिस्सा हैं जितने हम। उनकी आँखों की बनावट या उनकी बोलने की शैली उन्हें ‘गैर-भारतीय’ नहीं बना देती।

हमें अपने बच्चों को सिखाना होगा कि भारत की सुंदरता उसके रंगों और चेहरों की विविधता में है। हमारी किताबों में उत्तर-पूर्व का इतिहास कम पढ़ाया जाता है, जिसे बदलने की जरूरत है। साथ ही, जब हमारी आँखों के सामने कोई किसी को “मोमो” या “चिंकी” कहकर पुकारे, तो हमें चुप नहीं रहना चाहिए। हमारी चुप्पी ही अपराधियों का हौसला बढ़ाती है।

एंजेल चकमा को सच्ची श्रद्धांजलि तभी मिलेगी जब हम अपने मन के इस काले पूर्वाग्रह को साफ करेंगे। इंसाफ सिर्फ अदालत के फैसले में नहीं होता, बल्कि समाज के नजरिए में भी होना चाहिए। हमें एक ऐसा भारत बनाना होगा जहाँ किसी भी ‘एंजेल’ को अपनी पहचान की वजह से जान न देनी पड़े।

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