
27 सितंबर 2025 को तमिलनाडु के करूर ज़िले में वह मंजर सामने आया, जिसे सुनना भी रूह कंपा देता है। एक मशहूर फिल्म अभिनेता से नेता बने विजय की चुनावी रैली में हजारों लोग उमड़े मंच, नारों और भीड़ के बीच अचानक मौत और अफरातफरी का मंजर 41 मासूम जिंदगियां कुचल गईं, सौ से अधिक लोग घायल।
यह हादसा महज एक ट्रैजडी नहीं, लोकतंत्र के ‘लोक’ और ‘तंत्र’ दोनों पर गहरा सवाल बन गया। क्या भीड़, नायकत्व और राजनीति की दिखावेबाज़ी के सामने नियंत्रित व्यवस्थाएँ इतनी कमजोर हैं? क्या ऐसे हादसे सिर्फ किस्मत, भीड़ या किसी तकनीकी गड़बड़ी का नतीजा होते हैं, या उसके पीछे लापरवाही, सिस्टम और जवाबदेही के अभाव की परछाईं है?
रैली के लिए प्रशासन ने 10,000 लोगों की अनुमति दी थी, लेकिन भीड़ अनुमान से कहीं ज्यादा, 25,000 से ऊपर पहुँच गई थी। लोग सुबह से ही स्थानीय मैदान में उमड़ने लगे। भीषण गर्मी, घंटों इंतजार, पानी और छांव की किल्लत हर कोई बस ‘दर्शन’ की आस में डटा था। विजय के काफिले का सात घंटे देरी से पहुंचना, तकनीकी खराबी, स्पीकर का साथ छोड़ना और भीड़ के दीदार की बेकरारी यही वह क्षण था जब हजारों लोग मंच व सड़क की तरफ भागे, और बेकाबू भीड़ में अफरा-तफरी में दबकर कई लोग दम तोड़ गए।
इस रैली में सुरक्षा और प्रबंधन के सारे मानक हवा हो गए। न तो वॉलेंटियर्स की संख्या पर्याप्त थी, न बफर ज़ोन, न मेडिकल सुविधा और न ही व्यवस्थित एग्जिट। पुलिस और आयोजक दोनों के बीच अनुमति, जिम्मेदारी और तैयारी को लेकर तालमेल ही नहीं था। आरोप हैं कि अभिनेता विजय की रैली में आयोजकों ने पुण्य लाभ, शक्ति प्रदर्शन और भीड़ का इम्प्रेशन गिनने में ज़्यादा दिलचस्पी दिखाई, बजाय सुरक्षा और नियंत्रण के।
रैली स्थल पर उपस्थित लोगों ने खुलेआम बताया आयोजन स्थल छोटा, बाहर निकलने के रास्ते अस्पष्ट, और भीड़ मैनेजमेंट के कोई आधुनिक इंतजाम नहीं। बेकाबू भीड़ मंच के नजदीक पहुंचने की जद्दोजहद में नियंत्रण से बाहर हो गई। हादसे के बाद राज्य सरकार ने राहत का एलान किया, उच्च स्तरीय जांच समिति का गठन किया गया। पुलिस ने आयोजकों पर आपराधिक लापरवाही, लोगों की जान को खतरे में डालना और इजाजत का उल्लंघन जैसे आरोप लगाए. मेडिकल और आपातकालीन टीमें घंटों मशक्कत करती रहीं, लेकिन जो ज़िंदगियां चली गईं वे न लौट सकती थीं।
मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन और सभी दलों के नेताओं ने मुआवज़ा घोषित किया, जाँच आयोग बैठाया, लेकिन सवाल यह है क्या इतनी बड़ी चूक के बाद सिर्फ जांच और सांत्वना ही काफी है? भारत में धर्म, राजनीति व सामाजिक आयोजनों में भगदड़, क्रश और मौतें कोई नई बात नहीं। चाहे कुभ मेलों की भगदड़ हो, मंदिर या चुनावी रैलियों में धक्का-मुक्की हर बार कहीं न कहीं भीड़ नियंत्रण व्यवस्था फेल होती रही है। लोगों की भावनाएं, आयोजकों की लापरवाहियां और सिस्टम का आलस्य, ये त्रासदियों के स्थायी तत्व बन गए हैं।
केवल तात्कालिक राहत, जांच और सजा समाधान नहीं है। प्रत्येक बड़े आयोजन से पहले प्रोफेशनल क्राउड मैनेजमेंट एजेंसियों, डिजिटल इंट्री-पास, लाइव काउंटिंग और सेफ्टी मार्शल्स की व्यवस्था अनिवार्य हो। आयोजन स्थल का स्थल-विश्लेषण, उपयुक्त बफर जोन, मेडिकल वैन और कंट्रोल्ड एग्जिट/एंट्री जरूरी हो। नेताओं, आयोजकों और पुलिस के लिए क्राउड सेफ्टी पर नियमित ट्रेनिंग, जवाबदेही और एमरजेंसी सिमुलेशन हों। जो भीड़ नियंत्रण व सुरक्षा नियमों को नजरअंदाज करे, उसपर कड़ी सजा का प्रावधान बने।
जनता को भी अपनी सुरक्षा के प्रति जागरूक होना होगा, आयोजकों की ‘भीड़ वाली राजनीति’ से बचना होगा। नेताओं को चाहिए जितना फोकस भाषण, नारेबाजी और राजनीति पर है, उससे दोगुना आयोजन की सुरक्षा पर हो। प्रशासन को संजीदगी और पेशेवर जवाबदेही निभानी होगी।
करूर की त्रासदी एक जिंदा चेतावनी है कि भीड़ का मतलब सिर्फ सियासी ताकत नहीं, बल्कि उसे संभालना एक मानवीय उत्तरदायित्व है। यह घटना सिर्फ तमिलनाडु या फिल्मी नायक की रैली तक सीमित नहीं बल्कि पूरे लोकतांत्रिक भारत के लिए एक सबक है।
अगली बार कोई रैली, आयोजन या जुलूस हो तो आयोजन से पहले, सबसे बड़ा सवाल यही हो ‘लोग सुरक्षित हैं या नहीं?’ क्योंकि भीड़ में उत्साह है, समाज है पर उसमें गलत सिस्टम हो, तो सपने ही नहीं, जिंदगियां भी कुचल जाती हैं।



