
जब भी भारत कोई नया वैश्विक व्यापार समझौता करता है, उम्मीदें भी बढ़ती हैं और डर भी। निवेश, नौकरियों और आर्थिक तरक्की का वादा जितना बड़े अख़बारों की सुर्खियाँ बनता है, उसी के साथ खेत-खलिहानों से मन में संशय और प्रतिरोध की आवाज़ भी उठती है। बीते कुछ सालों में ईएफटीए, यूके, अमेरिका समेत तमाम देशों के साथ बातचीत में, देश के किसान खुद को पीछे छूटा हुआ और असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
भारतीय किसान बड़े बाज़ार, तकनीक, ग्लोबल मांग आपूर्ति के असर को अब अच्छे से समझते हैं। असल चिंता यह है कि अगर विदेश से सस्ते कृषि उत्पाद आ गए या नियम ऐसे बने कि भारतीय मंडियों पर विदेशी कंपनियाँ हावी हो जाएं, तो छोटे मझोले किसान अपनी उपज बेच भी पाएंगे या नहीं?
मलेशिया से सस्ता पाम ऑयल या ऑस्ट्रेलिया से दाल आने पर देसी किसान की आमदनी गिर जाती है। WTO जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठन अक्सर भारत पर बैठकर MSP और सब्सिडी कम करने का दबाव बनाते हैं, जबकि अमीर देश अपने किसानों को बहुत ज्यादा मदद देते रहते हैं। किसान यूनियन का डर है कि इस प्रकार के समझौते से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और सरकारी खरीद की सुरक्षा धीरे–धीरे खत्म हो सकती है।
पिछले वर्षों में जैसा पंजाब, हरियाणा, यूपी, महाराष्ट्र में देखने को मिला किसान बीज खाद से ज्यादा व्यापार और नीति के मुद्दों पर सड़कों पर रहे हैं। उनकी माँगें हैं MSP को कानूनी गारंटी मिले; विदेशी आयात से उनके बाज़ार को नुकसान न हो; WTO और FTA जैसी बातों पर बिना किसान संवाद के कोई बड़ा कदम न उठे; छोटे मझोले किसानों के लिए खास सुरक्षा; अंतर्राष्ट्रीय मानक लागू करने से पहले उनकी खेती के तरीके, लागत और स्थानीय जरूरतों को समझा जाए। इन मांगों में केवल नाराज़गी नहीं है, बल्कि भविष्य को लेकर गहरी चिंता छुपी है “अगर हमारी आज़ादी, दाम और बाजार छिन जाएंगे, तो हम टिकेंगे कैसे?”
कृषि नीति और व्यापार नीति का फासला दिन–ब–दिन कम होता जा रहा है। आज अगर MSP या मंडी कानून में बदलाव आता है तो उससे सीधे किसान की रोज़ी–रोटी, बच्चों की फीस और पूरे गाँव का जीवन प्रभावित होता है। दूसरी तरफ सरकारों का कहना है अगर भारत को दुनिया में आगे बढ़ना है और निवेश लाना है, तो खुलापन और प्रतिस्पर्धा जरूरी है। जो किसान दिल्ली, मुंबई या चेन्नई की मंडी तक बेच नहीं सकता, क्या वह लंदन, पेरिस का बाजार जीत पाएगा? जिनके पास सिंचाई, भंडारण या मार्केटिंग की सुविधा नहीं, वे WTO के नियमों के बीच अस्पताल, शिक्षा, दवा की कीमतें कैसे झेलेंगे?
भारत में अधिकतर किसान छोटे जोत वाले हैं उनकी खेती मौसम, पानी, बीमारी, और रोज़ बदलते बाजार भाव पर टिकी है। FTA या WTO में 10% से ज्यादा सब्सिडी रोकने का नियम हो जाए, तो खाद्यान्न, दूध, दाल, तेल, रुई जैसी फसलों के लिए MSP देना सरकार के लिए मुश्किल हो जाएगा। फिर अगर आयात शुल्क घटा तो विदेशी सस्ते माल का सीधा असर किसान की कमाई पर पड़ेगा।
किसान नेताओं की मांग यही है कि विदेशी व्यापार की शर्तों में “भारत के संवेदनशील कृषि क्षेत्र” को अलग रखा जाए; जितने भी समझौते हों, संसद और सार्वजनिक विमर्श से होकर गुज़रें; बिना कृषि-हित गारंटी के कोई दस्तखत न हो।
पिछले सालों में किसान आंदोलनों की सबसे बड़ी आवाज़ यही रही “बिना खेत की बात समझे, कागज़ पर देश के अन्नदाता का फैसला न करो।” यह आंदोलन सिर्फ नाराजगी नहीं, बल्कि आर्थिक विचलन, बेरोजगारी और गांव के उजड़ने का डर, एक समुदाय का डर है कि कहीं दुनिया की चमक–दमक में भारतीय खेती सिरे से बदल न जाए या पीछे न छूट जाए।
इस बीच कुछ रास्ते ऐसे नज़र आते हैं, जिनसे भारत किसानों की आवाज़ को साथ लेकर भी वैश्विक व्यापार में आगे बढ़ सकता है सरकार अगर कोई बड़ा विदेशी समझौता करे तो उस पर किसान प्रतिनिधियों, विश्वविद्यालयों और कृषि विशेषज्ञों से खुला विमर्श करे। देश के संवेदनशील कृषि उत्पादों (जैसे दूध, गेहूं ) के लिए विशेष सुरक्षा कानून और बफर बनाए रखें, ताकि MSP या सरकारी खरीद पर कोई अंतर्राष्ट्रीय दबाव असर न डाले।
तकनीक और निवेश लाने के लिए समझौतों में यह शर्त रखी जाए कि वह सीधा खेत जोत, शोध, सिंचाई, भंडारण, फूड प्रोसेसिंग तक पहुँचे। छोटे किसानों कों डिजिटल मार्केट, मंडी लिंक, खेती की आय बढ़ाने वाली योजनाओं से जोड़ा जाए, ताकि वे सिर्फ़ कच्चा माल बेचने तक सीमित न रहें। आगामी सभी व्यापार समझौतों में पार्लियामेंटरी समीक्षा और सार्वजनिक राय सुनिश्चित की जाए।



