देवरपल्ली त्रासदी: थाली में परोसा गया ‘अधपका’ सच और छात्रावासों की आपराधिक उपेक्षा
मानवीय संवेदनाओं का ह्रास और माता-पिता की बेबसी

आंध्र प्रदेश के पोलावरम निर्वाचन क्षेत्र के देवरपल्ली गाँव से आई हृदयविदारक खबर ने एक बार फिर सरकारी आवासीय विद्यालयों और छात्रावासों की सुरक्षा और प्रबंधन पर गहरा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। गवर्नमेंट ट्राइबल वेलफेयर आश्रम हाई स्कूल (GTWAHS) के 80 मासूम छात्रों का दूषित नाश्ता (अधपकी इडली) खाने के बाद सामूहिक रूप से बीमार पड़ना केवल एक ‘खाद्य विषाक्तता’ (Food Poisoning) की घटना नहीं है, बल्कि यह उन जनजातीय बच्चों के जीवन के साथ किया गया एक आपराधिक खिलवाड़ है, जिनके बेहतर भविष्य की जिम्मेदारी सरकार ने अपने कंधों पर ली थी।
आंध्र प्रदेश के मरेडु मल्ली मंडल के सुनमपाडु पंचायत के अंतर्गत आने वाले इस आश्रम स्कूल में सोमवार की सुबह किसी डरावने सपने जैसी थी। जैसे ही छात्रों ने सुबह का नाश्ता किया, कुछ ही मिनटों में उन्हें जी मिचलाने, पेट दर्द और उल्टी की शिकायत होने लगी। देखते ही देखते 80 छात्र इसकी चपेट में आ गए। एम्बुलेंस के सायरन और चीखते-चिल्लाते बच्चों ने पूरे मंडल में दहशत पैदा कर दी। यह घटना उस समय हुई जब हम ‘पोषण’ और ‘स्वच्छ भारत’ जैसे अभियानों का ढिंढोरा पीट रहे हैं।
इस घटना की सबसे दर्दनाक सच्चाई यह है कि यह रोकी जा सकती थी। माता-पिता और स्थानीय निवासियों के अनुसार, यह कोई अचानक हुई दुर्घटना नहीं थी। रविवार को भी दो बच्चों की तबीयत इसी तरह खराब हुई थी। उन्होंने छात्रावास प्रशासन से शिकायत की थी कि भोजन की गुणवत्ता सही नहीं है। यदि वार्डन और रसोई प्रबंधन ने उसी समय गंभीरता दिखाई होती और राशन व खाना बनाने की प्रक्रिया की जांच की होती, तो सोमवार को 80 बच्चों की जान जोखिम में नहीं पड़ती। प्रारंभिक जांच में पाया गया कि इडली बनाने के लिए इस्तेमाल किया गया घोल या तो पुराना था या उसे ठीक से पकाया नहीं गया था। अधपकी इडलियाँ (Undercooked Idlis) शरीर के भीतर जाकर संक्रमण और विषाक्तता का कारण बनीं।
आश्रम स्कूल विशेष रूप से दूरदराज के क्षेत्रों के जनजातीय बच्चों के लिए बनाए गए हैं। इन स्कूलों में बच्चे अपने माता-पिता से दूर इस उम्मीद में रहते हैं कि सरकार उन्हें भोजन और शिक्षा देगी। लेकिन देवरपल्ली की घटना ने व्यवस्था के कई काले पहलुओं को उजागर किया है छात्रावास नियमों के अनुसार, भोजन परोसे जाने से पहले वार्डन को उसे चखना चाहिए। यदि वार्डन ने आज सुबह इडली चखी होती, तो उन्हें उसके कच्चेपन का पता चल जाता। अक्सर यह देखा जाता है कि ठेकेदार और स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत से छात्रावासों को घटिया स्तर का अनाज और राशन सप्लाई किया जाता है। सड़ा हुआ चावल या पुराना आटा अक्सर ऐसी बीमारियों का मूल कारण होता है। रसोई घरों की स्थिति दयनीय है। जहाँ खाना बनता है, वहां साफ-सफाई के मानकों का पालन नहीं किया जाता, जिससे हानिकारक बैक्टीरिया (जैसे साल्मोनेला या ई. कोली) खाने में प्रवेश कर जाते हैं।
जब 80 बच्चों को एम्बुलेंस में भर-भरकर अस्पताल ले जाया जा रहा था, तो माता-पिता का आक्रोश फुट पड़ा। ये वो लोग हैं जो कड़ी मेहनत कर अपने बच्चों को पढ़ने भेजते हैं। स्कूल परिसर के बाहर माता-पिता का प्रदर्शन केवल आज की घटना के लिए नहीं था, बल्कि यह उस संचित गुस्से का परिणाम था जो लंबे समय से मिल रहे दूषित भोजन के कारण बढ़ रहा था। स्थानीय नेताओं ने स्कूल प्रबंधन की कड़ी निंदा की है। उन्होंने आरोप लगाया कि शिकायतों के बावजूद उच्चाधिकारियों ने कभी इस स्कूल का औचक निरीक्षण (Surprise Inspection) नहीं किया।
इतनी बड़ी संख्या में बच्चों का एक साथ बीमार होना किसी भी ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्र के लिए चुनौती है।अचानक इतने बच्चों को ले जाने के लिए एम्बुलेंस की व्यवस्था करने में अफरा-तफरी मच गई। अस्पताल में बच्चों को डिहाइड्रेशन से बचाने के लिए आईवी फ्लुइड्स (IV Fluids) और एंटी-बायोटिक्स दिए जा रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि स्थिति नियंत्रण में है, लेकिन 80 बच्चों का एक साथ निगरानी में होना प्रशासन की विफलता का बड़ा स्मारक है।
हर ऐसी घटना के बाद एक जांच कमेटी बिठा दी जाती है और कुछ रसोइयों को हटा दिया जाता है। लेकिन क्या इससे व्यवस्था सुधरेगी?स्कूल वार्डन और मुख्य रसोइए पर केवल विभागीय कार्रवाई नहीं, बल्कि ‘इरादतन हत्या की कोशिश’ या ‘लापरवाही से जीवन को खतरे में डालने’ की धाराओं के तहत प्राथमिकी (FIR) दर्ज होनी चाहिए। हर छात्रावास में एक समिति होनी चाहिए जिसमें अनिवार्य रूप से दो अभिभावक सदस्य हों, जो रोज सुबह नाश्ते और खाने की जांच करें। राशन की गुणवत्ता और भोजन बनने की प्रक्रिया की सीसीटीवी निगरानी होनी चाहिए, जिसका एक्सेस जिला कलेक्टर कार्यालय के पास हो। हर 15 दिन में छात्रावास के बच्चों का स्वास्थ्य परीक्षण अनिवार्य होना चाहिए ताकि कुपोषण या अन्य बीमारियों का समय पर पता चल सके।
देवरपल्ली के GTWAHS स्कूल की यह घटना हमें याद दिलाती है कि जब प्रशासन संवेदनहीन हो जाता है, तो उसकी कीमत मासूम बच्चों को चुकानी पड़ती है। अधपकी इडली केवल एक रसोइए की गलती नहीं है, बल्कि यह उस पूरे तंत्र की विफलता है जिसने जनजातीय बच्चों को केवल ‘आंकड़ों’ तक सीमित कर दिया है।
यदि आज 80 बच्चे अस्पताल में हैं, तो इसकी जिम्मेदारी मुख्यमंत्री से लेकर स्थानीय शिक्षा अधिकारी तक सबकी है। हमें यह समझना होगा कि बच्चों की थाली में परोसा जाने वाला खाना उनके भविष्य का ईंधन है। यदि वह ईंधन ही जहरीला होगा, तो हम एक स्वस्थ राष्ट्र की कल्पना कैसे कर सकते हैं? सरकार को इस मामले में ऐसी कठोर कार्रवाई करनी चाहिए जो पूरे देश के छात्रावासों के लिए एक मिसाल बने।



