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जनसांख्यिकीय स्थिरता और राष्ट्रीय अस्मिता: मोहन भागवत के ‘तीन बच्चे’ फॉर्मूले का गहन विश्लेषण

19-25 की आयु और तीन बच्चे: तर्क और विज्ञान

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत द्वारा जनसंख्या नीति और पारिवारिक ढांचे पर दिया गया हालिया बयान केवल एक सुझाव नहीं, बल्कि भारत के भविष्य के जनसांख्यिकीय मानचित्र को लेकर एक गहरी चिंता का प्रकटीकरण है। भागवत का यह कहना कि “गृहस्थों को कम से कम तीन बच्चे पैदा करने चाहिए और विवाह की आयु 19 से 25 वर्ष के बीच होनी चाहिए,” समाज के विभिन्न वर्गों में एक व्यापक विमर्श को जन्म दे चुका है।

मोहन भागवत ने नागपुर में एक कार्यक्रम के दौरान ‘लोकसंख्या शास्त्र’ (Demography) के बुनियादी सिद्धांतों का हवाला देते हुए समाज के सामने एक गंभीर संकट रखा। उनके तर्क के केंद्र में यह विचार था कि कोई भी समाज जो अपनी प्रतिस्थापन दर (Replacement Rate) को बनाए रखने में विफल रहता है, वह कालांतर में सांस्कृतिक और भौतिक रूप से विलुप्त हो जाता है।

भागवत ने तर्क दिया कि जनसंख्या विज्ञान के अनुसार, यदि किसी समाज की कुल प्रजनन दर (TFR) 2.1 से नीचे गिरती है, तो वह समाज संकट में आ जाता है। सांख्यिकीय रूप से 2.1 का अर्थ है कि प्रत्येक जोड़े के कम से कम दो बच्चे होने चाहिए, लेकिन समाज में कुछ लोग अविवाहित रहते हैं या निःसंतान रहते हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए गृहस्थों को ‘तीन’ का लक्ष्य रखना चाहिए। उन्होंने दुनिया के कई देशों (जैसे जापान और इटली) का उदाहरण दिया जहाँ कम जन्म दर के कारण पूरा सामाजिक ढांचा चरमरा रहा है।

भागवत ने विवाह के लिए 19 से 25 वर्ष की आयु का सुझाव दिया, जो आधुनिक शहरी जीवनशैली के ठीक विपरीत है। भागवत का मानना है कि इस आयु वर्ग में विवाह करने से प्रजनन क्षमता बेहतर होती है और माता-पिता व बच्चों के बीच आयु का अंतर कम होने से भावनात्मक जुड़ाव बेहतर रहता है। उन्होंने एक रोचक तर्क दिया कि तीन बच्चे होने से वे आपस में चीजों को साझा करना और सामंजस्य बिठाना सीखते हैं, जो ‘इकलौती संतान’ (Single Child) के मामले में अक्सर चुनौती होती है।

RSS प्रमुख ने जनसंख्या के ‘नंबरों’ से अधिक उसके ‘असंतुलन’ (Imbalance) पर जोर दिया। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि यदि जनसंख्या का असंतुलन धर्मांतरण या अवैध घुसपैठ के कारण होता है, तो यह देश की भौगोलिक अखंडता के लिए खतरा बन सकता है।भारत के दक्षिण राज्यों में TFR 1.5-1.7 तक गिर गया है, जबकि उत्तर भारत में यह अभी भी 2.0 के आसपास है। यह असंतुलन भविष्य में संसद की सीटों के ‘परिसीमन’ (Delimitation) के समय एक बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा कर सकता है।

भागवत के सुझाव का सबसे बड़ा विरोध आर्थिक धरातल पर होता है। 2026 के भारत में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की लागत इतनी अधिक है कि एक मध्यमवर्गीय परिवार के लिए तीन बच्चों को गुणवत्तापूर्ण जीवन देना लगभग असंभव सा प्रतीत होता है। वर्तमान युग में महिलाएं शिक्षा और करियर को प्राथमिकता दे रही हैं। 19-25 की आयु में विवाह और फिर तीन बच्चे पालना, कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी (LFPR) को कम कर सकता है, जो अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह हो सकता है।

यह बयान एक वैचारिक युद्ध की तरह है जहाँ एक तरफ पारंपरिक पारिवारिक मूल्य हैं और दूसरी तरफ व्यक्तिगत स्वतंत्रता। आलोचकों का कहना है कि प्रजनन संबंधी निर्णय पूरी तरह से निजी होने चाहिए और इसमें किसी संगठन या धर्म का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।भागवत का यह आह्वान समाज को एक ‘सामूहिक जिम्मेदारी’ का बोध कराने का प्रयास है, जहाँ व्यक्ति को अपने परिवार से ऊपर उठकर समाज और राष्ट्र के दीर्घकालिक अस्तित्व के बारे में सोचने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।

भारत सरकार ने दशकों तक “छोटा परिवार, सुखी परिवार” और “हम दो, हमारे दो” का नारा दिया है। कई राज्यों ने तो ‘दो बच्चों की नीति’ (Two Child Policy) के उल्लंघन पर चुनाव लड़ने या सरकारी लाभों से वंचित करने के कानून भी बनाए हैं। भागवत का बयान इस सरकारी नीति के विपरीत खड़ा दिखता है। यह आने वाले समय में एक नई राष्ट्रीय जनसंख्या नीति (National Population Policy) की आवश्यकता को रेखांकित करता है, जो केवल नियंत्रण पर नहीं, बल्कि ‘संतुलन’ पर आधारित हो।

मोहन भागवत का सुझाव हमें एक ऐसी हकीकत की ओर ले जाता है जिसे अक्सर ‘राजनीतिक शुद्धता’ (Political Correctness) के कारण नजरअंदाज कर दिया जाता है। जनसंख्या केवल बोझ नहीं, बल्कि संसाधन भी है। यदि भारत की प्रजनन दर बहुत अधिक गिरती है, तो हम अपनी ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ (Demographic Dividend) खो देंगे और तेजी से बूढ़े होते समाज में तब्दील हो जाएंगे।

हालांकि, 19-25 वर्ष की आयु और तीन बच्चों का सुझाव आज की आर्थिक परिस्थितियों में कई लोगों के लिए अव्यावहारिक हो सकता है। समाधान शायद ‘संख्या’ बढ़ाने में नहीं, बल्कि ‘असंतुलन’ को ठीक करने और हर नागरिक को चाहे वह किसी भी धर्म का हो समान जनसंख्या नियमों के दायरे में लाने में है। भागवत का बयान हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम केवल ‘आज’ के सुख के लिए ‘कल’ के अस्तित्व को जोखिम में डाल रहे हैं?

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