
स्वतंत्र भारत के इतिहास में आज का दिन एक ऐसी प्रशासनिक क्रांति का गवाह बना है, जिसकी चर्चा आने वाले दशकों तक की जाएगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ‘सेवा तीर्थ’ (Seva Teerth) का उद्घाटन न केवल देश के सबसे शक्तिशाली कार्यालय के पते का बदलना है, बल्कि यह औपनिवेशिक मानसिकता के अवशेषों को त्यागकर एक आधुनिक, कुशल और पारदर्शी भारत की ओर बढ़ने का एक सशक्त उद्घोष है। 1947 के बाद पहली बार प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) को एक ऐसे एकीकृत और भविष्योन्मुखी परिसर में स्थानांतरित किया गया है, जो 21वीं सदी की चुनौतियों से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है।
दशकों से लुटियंस दिल्ली की साउथ ब्लॉक की इमारतें भारतीय सत्ता का प्रतीक रही हैं। ब्रिटिश वास्तुशिल्प द्वारा निर्मित ये इमारतें भव्य तो थीं, लेकिन आधुनिक युग की तकनीकी आवश्यकताओं, सुरक्षा चुनौतियों और प्रशासनिक समन्वय की दृष्टि से अब अपर्याप्त साबित हो रही थीं। ‘सेवा तीर्थ’ इसी शून्यता को भरने के लिए बनाया गया एक ‘स्मार्ट’ और ‘एकीकृत’ समाधान है।
‘सेवा तीर्थ’ का निर्माण सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना के एक महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में किया गया है। इसकी आवश्यकता के पीछे कई गंभीर कारण थे अब तक पीएमओ के विभिन्न विभाग दिल्ली के अलग-अलग हिस्सों और साउथ ब्लॉक के विभिन्न कोनों में फैले हुए थे। इससे अंतर-विभागीय समन्वय में देरी होती थी। ‘सेवा तीर्थ’ इन सभी को एक ‘इंटीग्रेटेड हब’ में लाता है। डिजिटल युग में फिजिकल सुरक्षा के साथ-साथ साइबर सुरक्षा और डेटा गोपनीयता सर्वोपरि है। पुराने परिसरों में आधुनिक सुरक्षा उपकरणों को फिट करना मुश्किल था। ‘सेवा तीर्थ’ को ‘सिक्योरिटी बाय डिजाइन’ (Security by Design) के सिद्धांत पर बनाया गया है। बढ़ता कार्यभार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की मांगों को देखते हुए, एक ऐसे स्थान की जरूरत थी जहाँ दुनिया भर के नेताओं और डेलीगेशन की मेजबानी के लिए विश्वस्तरीय सुविधाएं हों।
यह परिसर केवल ईंट और कंक्रीट का ढांचा नहीं है, बल्कि यह ‘न्यू इंडिया’ के विजन को प्रतिबिंबित करता है। यहाँ से प्रधानमंत्री न केवल देश की आंतरिक स्थिति पर नजर रख सकते हैं, बल्कि दुनिया भर के भारतीय मिशनों के साथ पलक झपकते ही सुरक्षित संपर्क साध सकते हैं। ‘सेवा तीर्थ’ को पूरी तरह से डिजिटल वर्कफ्लो के लिए तैयार किया गया है। यहाँ फाइलों का संचलन (File movement) अब पूरी तरह सुरक्षित नेटवर्क पर होगा, जिससे सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और गति आएगी। यह परिसर ‘एनर्जी एफिशिएंट’ है और इसे ‘जीरो डिस्चार्ज’ कचरा प्रबंधन प्रणालियों के साथ बनाया गया है। भारतीय कला और संस्कृति की छाप इसकी दीवारों और दीर्घाओं में देखी जा सकती है।
‘सेवा तीर्थ’ का उद्घाटन प्रधानमंत्री के उस मंत्र को साकार करता है जिसमें शासन को नागरिक-केंद्रित बनाने की बात कही गई है।एकीकृत परिसर होने के कारण अब कैबिनेट सचिवालय, राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (NSC) और पीएमओ के बीच की दूरी कम हो गई है। आपातकालीन स्थितियों में यह ‘सिंगल विंडो’ आर्किटेक्चर जीवन रक्षक साबित हो सकता है। प्रधानमंत्री अब वास्तविक समय (Real-time) में देश की प्रमुख परियोजनाओं और योजनाओं की प्रगति की निगरानी यहाँ लगे डैशबोर्ड्स के माध्यम से कर सकेंगे। विदेशी राष्ट्राध्यक्षों के स्वागत के लिए यहाँ विशेष गलियारे और मीटिंग हॉल बनाए गए हैं, जो भारत की बढ़ती वैश्विक साख के अनुरूप हैं।
इस ऐतिहासिक अवसर को चिरस्थाई बनाने के लिए प्रधानमंत्री द्वारा ₹100 का स्मारक सिक्का जारी करना एक गहरा अर्थ रखता है।स्मारक सिक्के आमतौर पर महान विभूतियों या अत्यंत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं के लिए जारी किए जाते हैं। पीएमओ के स्थानांतरण को इस श्रेणी में रखना यह दर्शाता है कि सरकार इसे भारत के ‘लोकतांत्रिक ढांचे के नवीनीकरण’ के रूप में देखती है।सिक्के पर ‘सेवा तीर्थ’ की आकृति और ‘सत्यमेव जयते’ का अंकन भारत के गौरवशाली अतीत और प्रगतिशील भविष्य के बीच एक सेतु की तरह है।
‘सेवा तीर्थ’ नाम अपने आप में एक वैचारिक संदेश है। ब्रिटिश काल में सरकारी भवनों को ‘प्रभुत्व’ (Dominance) के प्रतीक के रूप में देखा जाता था। ‘तीर्थ’ शब्द की पवित्रता और ‘सेवा’ का संकल्प यह सुनिश्चित करता है कि यहाँ काम करने वाला हर अधिकारी और कर्मचारी यह महसूस करे कि वे जनता के प्रति जवाबदेह हैं। यह परिसर अब रायसीना हिल्स की उस पुरानी परंपरा को तोड़ता है जो जनता और प्रशासन के बीच एक दीवार खड़ी करती थी।
आने वाले दशकों में भारत एक आर्थिक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है। ‘सेवा तीर्थ’ इस यात्रा का सारथी होगा। नए पीएमओ में एआई और डेटा एनालिटिक्स के लिए समर्पित विंग्स होने की संभावना है, जो नीति-निर्माण को अधिक सटीक बनाएंगे। भविष्य की महामारियों या प्राकृतिक आपदाओं के दौरान, यह परिसर भारत के ‘वार रूम’ के रूप में काम करेगा, जहाँ से पूरे देश की मशीनरी को निर्देशित किया जा सकेगा।
‘सेवा तीर्थ’ का उद्घाटन भारत के प्रशासनिक इतिहास का वह पन्ना है जिसे कभी नहीं मिटाया जा सकेगा। स्वतंत्र भारत के प्रधानमंत्री का कार्यालय अब एक ऐसी छत के नीचे है जो पूरी तरह से भारतीय है, आधुनिक है और कुशल है। यह केवल पते का बदलाव नहीं, बल्कि एक नए संकल्प की शुरुआत है।
अमृत काल में ‘सेवा तीर्थ’ की गूँज भारत के हर कोने में सुनाई देनी चाहिए, जहाँ नीतियां केवल कागजों पर नहीं, बल्कि डिजिटल गति से लोगों के जीवन में बदलाव लाएं। ₹100 का सिक्का और यह नई इमारत भविष्य के भारत को यह याद दिलाते रहेंगे कि शासन की शक्ति उसकी भव्यता में नहीं, बल्कि जनता की ‘सेवा’ में निहित है।



