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लालबागचा राजा की भव्य विसर्जन शोभायात्रा: मुंबई में उमड़ा आस्था का महासागर

'गणपति बप्पा मोरया, पुढ़च्या वर्षी लवकर या' के जयघोष से गूंजी मायानगरी

देश की आर्थिक राजधानी और सपनों के शहर मुंबई में शुक्रवार, अनंत चतुर्दशी के पावन अवसर पर भक्ति, उल्लास, संगीत और आध्यात्मिक पराकाष्ठा का वह अद्भुत दृश्य साकार हुआ जिसका समूचा विश्व वर्ष भर इंतजार करता है। मध्य मुंबई के परेल-लालबाग क्षेत्र से ‘नवसाचा गणपति’ यानी मन्नत पूरी करने वाले लालबागचा राजा की ऐतिहासिक और विश्व-प्रसिद्ध विसर्जन शोभायात्रा प्रारंभ हो गई। ग्यारह दिनों तक चले 93वें लालबागचा राजा गणेशोत्सव के समापन पर अपने आराध्य देवाधिदेव गणपति बप्पा को अंतिम विदाई देने के लिए लालबाग की संकरी गलियों से लेकर दक्षिण मुंबई के समुद्री तटों तक आस्था का जनसैलाब उमड़ पड़ा है।
हवा में उड़ता लाल-गुलाबी गुलाल, ढोल-ताशा पथकों की गूंजती ऊर्जावान थाप, झांझ और मंजीरों की झंकार, लेजिम नृत्य की अनुशासित प्रस्तुतियां और “गणपति बप्पा मोरया, पुढ़च्या वर्षी लवकर या” के गगनभेदी नारों के बीच राजा का भव्य पुष्प-सुसज्जित रथ अपने पारंपरिक मार्ग पर आगे बढ़ रहा है। 1934 में स्थापित लालबागचा राजा सार्वजनिक गणेशोत्सव मंडल के इस 93वें वर्ष में भी विसर्जन यात्रा का यह कारवां केवल एक धार्मिक अनुष्ठान न रहकर मुंबई की ‘सर्वधर्म समभाव’ और सामाजिक एकता की जीवंत मिसाल बनकर उभरा है।
विसर्जन का दिन लालबाग के निवासियों और करोड़ों भक्तों के लिए अत्यंत भावुक और आंसुओं से भरा होता है। ग्यारह दिनों तक जिस पंडाल में अनवरत ‘चरण स्पर्श’ और ‘मुख दर्शन’ के लिए 24-24 घंटे लंबी कतारें लगी थीं, वहां शुक्रवार तड़के अंतिम दर्शन की प्रक्रिया को पूर्ण विधि-विधान के साथ संपन्न किया गया
वैदिक ब्राह्मणों के मंत्रोच्चार के बीच राजा की उत्तरपूजा की गई, जिसमें बप्पा से वर्ष भर में हुई किसी भी भूल-चूक के लिए क्षमा मांगी गई और अगले वर्ष शीघ्र पुनः पधारने की प्रार्थना की गई। इसके उपरांत, 14 फीट ऊंची विशाल प्रतिमा को अत्यंत सावधानीपूर्वक विशाल पहियों वाले विशेष हाइड्रोलिक रथ पर विराजित किया गया। जैसे ही रथ ने पंडाल के द्वार की दहलीज को पार किया, विशेष कम्प्रेस्ड एयर तोपों (Air Cannons) के जरिए हवा में क्विंटलों लाल गुलाल उड़ाया गया। कुछ ही पलों में पूरा लालबाग क्षेत्र लाल और भगवा बादलों से ढक गया। श्रद्धालुओं के जयकारों से पूरा परिसर गूंज उठा।
लालबागचा राजा की विसर्जन यात्रा केवल एक सीधी सड़क पर चलने वाला जुलूस नहीं है, बल्कि यह मुंबई के सामाजिक ताने-बाने और इतिहास से होकर गुजरने वाला 24 घंटे का आध्यात्मिक उत्सव है रथ धीरे-धीरे चिंचपोकली रेलवे ब्रिज की ओर बढ़ता है। यहां का दृश्य देखने लायक होता है हजारों श्रद्धालु पुल के ऊपर, पुल के नीचे, दुकानों की छतों और पेड़ों की शाखाओं पर चढ़कर राजा के दर्शन के लिए घंटों प्रतीक्षा करते हैं। विभिन्न स्थानीय मंडलों द्वारा विशाल क्रेनों के जरिए 50-60 फीट की ऊंचाई से राजा के मुकुट पर गुलाब की पंखुड़ियों की बारिश की जाती है।
डिलाइल रोड से होते हुए रथ जब ऐतिहासिक भायखला और नागपाड़ा जंक्शन (खड़ा पारसी चौराहा) पर पहुंचता है, तो यह मुंबई के सांप्रदायिक सौहार्द का सबसे भावुक दृश्य प्रस्तुत करता है। यहां स्थानीय मुस्लिम, पारसी और ईसाई समुदाय के लोग स्टॉल लगाकर भक्तों को ठंडा पानी, शरबत, फल और चाय वितरित करते हैं। नागपाड़ा जंक्शन पर राजा का रथ कुछ समय के लिए रुकता है, जहां विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधि बप्पा का स्वागत करते हैं।
जैसे-जैसे रात गहराती है, श्रद्धालुओं का उत्साह और अधिक चरम पर पहुंचता है। दो टाकी (Two Tanks) और गोल देवल के ऐतिहासिक क्षेत्र में रोशनी की चकाचौंध के बीच भजन मंडलियां और वारकरी संप्रदाय के लोग अपनी ताल और मृदंग पर ‘विठ्ठल-विठ्ठल’ और ‘ज्ञानोबा-तुकाराम’ के जयघोष करते हैं। यहां की सड़कें इतनी खचाखच भरी होती हैं कि तिल रखने की भी जगह नहीं बचती।
शनिवार की भोर होते ही जुलूस ऑपेरा हाउस ब्रिज और सीपी टैंक से होते हुए गिरगांव की सीमा में प्रवेश करता है। गिरगांव, जो पारंपरिक मराठी संस्कृति और गणेशोत्सव का गढ़ माना जाता है, वहां के घरों की महिलाएं और युवतियां पारंपरिक नौवारी साड़ी पहनकर आरती की थालियां सजाए बप्पा की अगवानी करती हैं।
लाखों की भीड़ और संकीर्ण मार्गों को देखते हुए मुंबई पुलिस, बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC), और यातायात पुलिस ने महीनों पहले से तैयार की गई विशेष सुरक्षा योजना को जमीन पर उतारा है डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर रोड, लालबाग फ्लाईओवर, भायखला, नागपाड़ा, सरदार वल्लभभाई पटेल (SVP) रोड और मरीन ड्राइव की ओर जाने वाले रास्तों पर सामान्य वाहनों की आवाजाही पूर्णतः प्रतिबंधित कर दी गई है। मध्य और दक्षिण मुंबई के बीच संपर्क बनाए रखने के लिए ईस्टर्न फ्रीवे और कोस्टल रोड का उपयोग करने की सलाह दी गई है।
भीड़ में किसी भी अप्रिय घटना, भगदड़ या संदिग्ध गतिविधि को रोकने के लिए रैपिड एक्शन फोर्स (RAF), क्यूआरएफ (QRF) और आतंकवाद निरोधी दस्ते (ATS) की टुकड़ियां सादे कपड़ों में भीड़ के बीच गश्त कर रही हैं। लालबागचा राजा के रथ को सैटेलाइट जीपीएस ट्रैकर से लैस किया गया है, जिसकी लाइव लोकेशन मुंबई पुलिस के ट्रैफिक ऐप और कंट्रोल रूम की स्क्रीन पर लगातार अपडेट की जा रही है।
शोभायात्रा का सबसे मार्मिक, भावुक और चरम क्षण तब आता है जब शनिवार की सुबह उगते सूरज की पहली किरणों के साथ लालबागचा राजा का रथ गिरगांव चौपाटी के रेतीले तट पर पहुंचता है लालबागचा राजा की भारी-भरकम और 14 फीट ऊंची प्रतिमा को समुद्र में सुरक्षित रूप से विसर्जित करने के लिए महाराष्ट्र मैरीटाइम बोर्ड और बीएमसी द्वारा एक विशेष लोहे का फ्लोटिंग तराफा (नावों का प्लेटफॉर्म) तैयार किया जाता है।
ज्वार-भाटे (High Tide / Low Tide) के समय को ध्यान में रखते हुए, प्रशिक्षित तैराकों और बीएमसी के लाइफगार्ड्स की देखरेख में राजा को तट से करीब एक से दो किलोमीटर अंदर गहरे समुद्र में ले जाया जाता है। वहां समुद्र में अंतिम वैदिक आरती की जाती है और फिर धीरे-धीरे हाइड्रोलिक लिफ्ट के माध्यम से प्रतिमा को अरब सागर के जल में समाहित कर दिया जाता है। जिस क्षण राजा की प्रतिमा समुद्र के अथाह जल में विलीन होती है, तट पर उपस्थित लाखों श्रद्धालुओं की आंखें भर आती हैं। लोग हाथ जोड़कर अपने आराध्य से विदा लेते हैं और एक ही स्वर में गूंज उठते हैं “पुढ़च्या वर्षी लवकर या!” (अगले बरस जल्दी आना!)।
लालबागचा राजा की शोभायात्रा के समानांतर ही लालबाग की एक और ऐतिहासिक शान ‘मुंबई-चा राजा’ (गणेश गल्ली) की विसर्जन यात्रा भी आकर्षण का केंद्र बनी हुई है अपने 99वें गौरवशाली वर्ष में प्रवेश कर चुके गणेश गल्ली के 22 फीट ऊंचे ‘मुंबई-चा राजा’ के लिए इस वर्ष पहली बार एक विशालकाय समुद्री बार्ज (Barge) की व्यवस्था की गई है, जिसके जरिए प्रतिमा को खुले गहरे समुद्र में ले जाकर सम्मानपूर्वक विसर्जित किया जा रहा है।
लालबागचा राजा का विसर्जन केवल एक धार्मिक पर्व का अंत नहीं है, बल्कि यह मुंबई की उस अदम्य जिजीविषा, सामूहिक चेतना और अगाध आस्था का प्रतीक है जो जाति, धर्म, भाषा और आर्थिक विषमताओं की हर दीवार को एक झटके में ढहा देती है। करोड़पति उद्योगपति से लेकर सड़क किनारे दुकान लगाने वाले साधारण फेरीवाले तक, फिल्म सितारों से लेकर आम मिल-मजदूरों तक हर कोई इस दिन एक ही रंग में रंगा नजर आता है, और वह रंग है बप्पा की भक्ति का रंग।
24 घंटे की इस यात्रा के दौरान जो ऊर्जा, जो आंसू और जो समर्पण मुंबई की सड़कों पर देखने को मिलता है, वह दुनिया के किसी अन्य कोने में दुर्लभ है। जब शनिवार को अरब सागर की लहरें राजा को अपनी गोद में समेट लेंगी, तो मुंबई एक भारी मन और खालीपन के साथ अपने दैनिक जीवन की व्यस्त रफ्तार में फिर लौट जाएगी। लेकिन हर श्रद्धालु के दिल में यह विश्वास हमेशा की तरह अमर रहेगा कि उनके ‘मन्नत के राजा’ उनके दुखों और विघ्नों को अपने साथ ले गए हैं, और अगले वर्ष फिर एक नए उल्लास, नई आशा और नई कृपा के साथ अपनी प्रजा के बीच लौटेंगे।

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