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मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कांग्रेस का राष्ट्रव्यापी महा-संग्राम

पद से बर्खास्तगी और तत्काल गिरफ्तारी की मांग पर कई राज्यों में उग्र प्रदर्शन

भारत के लोकतांत्रिक और चुनावी इतिहास में शुक्रवार, 25 सितंबर का दिन एक अभूतपूर्व और बड़े संस्थागत टकराव के रूप में दर्ज हो गया। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) में कथित विसंगतियों और भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की आंतरिक कार्यप्रणाली को लेकर उपजा सियासी असंतोष शुक्रवार को राष्ट्रव्यापी जनाक्रोश में तब्दील हो गया।
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) के राष्ट्रव्यापी आह्वान पर देश के विभिन्न राज्यों दिल्ली, बिहार, पंजाब, हरियाणा, असम, पश्चिम बंगाल, मणिपुर, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, ओडिशा, कर्नाटक और जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस कार्यकर्ताओं और शीर्ष नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने, उनके खिलाफ आपराधिक प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने और उनकी तत्काल गिरफ्तारी की मांग को लेकर उग्र विरोध प्रदर्शन और घेराव मार्च किया।
राज्य निर्वाचन आयोग (CEO) कार्यालयों का घेराव करने निकले प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए प्रशासन को बड़े पैमाने पर बल प्रयोग करना पड़ा। पटना और चंडीगढ़ में पुलिस ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर वाटर कैनन (तेज पानी की बौछारें) चलाईं, वहीं मणिपुर के इंफाल में उग्र भीड़ को नियंत्रित करने के लिए आंसू गैस के गोले (Tear Gas Shells) दागे गए।
गुवाहाटी में बैरिकेड तोड़कर आगे बढ़ रहे लोकसभा में कांग्रेस के उपनेता गौरव गोगोई, पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग, राज्यसभा सांसद डॉ. सैयद नासिर हुसैन और दिल्ली प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष देवेंद्र यादव सहित सैकड़ों नेताओं को पुलिस ने हिरासत में ले लिया।
यह आंदोलन केवल सड़कों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ (INDIA) ने संसद के आगामी सत्र में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव (Impeachment Motion) लाने और सुप्रीम कोर्ट में विशेष जांच दल (SIT) की मांग को लेकर याचिका दाखिल करने तक का ऐलान कर दिया है।
सड़कों पर हुए इस देशव्यापी आंदोलन का तात्कालिक ट्रिगर एक प्रमुख राष्ट्रीय दैनिक (‘द इंडियन एक्सप्रेस’) में प्रकाशित वह खोजी रिपोर्ट बनी, जिसने भारत निर्वाचन आयोग की संवैधानिक निष्पक्षता और तीन सदस्यीय आयोग के आंतरिक कामकाज की परतें खोल दीं
भारत के निर्वाचन आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और दो चुनाव आयुक्त (EC) मिलकर एक बहु-सदस्यीय संस्था (Multi-member Body) बनाते हैं, जहां निर्णय आम सहमति या बहुमत से लिए जाने का संवैधानिक प्रावधान है।
अखबार की रिपोर्ट के अनुसार, अन्य दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार फाइलों पर लिखित रूप से अपनी औपचारिक आपत्तियां (Dissent) दर्ज कराई थीं। इनमें से चार आपत्तियां तो एक ही दिन दर्ज की गई थीं। आयुक्तों का आरोप था कि मतदाता सूची संशोधन, मतदाताओं के नाम काटने या जोड़ने (Addition/Deletion) और डेटाबेस एक्सेस से जुड़े कई संवेदनशील आदेश उनकी जानकारी या पूर्व सहमति के बिना सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त के कार्यालय द्वारा जारी कर दिए गए।
कांग्रेस और विपक्षी दलों का आरोप है कि पूरे देश में चलाए जा रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के तहत सुनियोजित तरीके से ‘वोट चोरी’ का तंत्र खड़ा किया गया है। विपक्ष के अनुसार बिहार, दिल्ली, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में लाखों वैध नागरिकों के नामों को बिना पर्याप्त नोटिस और फील्ड वेरिफिकेशन के केवल नए दस्तावेज न प्रस्तुत कर पाने के आधार पर ‘अनमैप्ड’ या संदिग्ध श्रेणी में डाल दिया गया है।
विपक्ष का दावा है कि इस प्रक्रिया का सर्वाधिक नुकसान हाशिए पर मौजूद समुदायों, अनुसूचित जातियों, जनजातियों, अल्पसंख्यकों और गरीब प्रवासी मजदूरों को उठाना पड़ रहा है, जिनके पास दशकों पुराने आवासीय दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं। विपक्ष ने मांग की है कि वास्तविक मतदाताओं को सूची में बनाए रखने के लिए वोटर आईडी कार्ड (EPIC) को ही पर्याप्त प्रमाण माना जाए, न कि जटिल भू-अभिलेख या दशकों पुराने दस्तावेज मांगे जाएं।
इन तीखे हमलों के जवाब में निर्वाचन आयोग के उच्चाधिकारियों ने कहा कि आंतरिक फाइलों पर आपत्तियां या कानूनी प्रश्न किसी टकराव का संकेत नहीं हैं, बल्कि यह एक बहु-सदस्यीय संस्था के भीतर स्वस्थ विचार-विमर्श और लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हैं।
आयोग ने स्पष्ट किया कि सभी अंतिम आदेश और वैधानिक नियम आयोग के पूर्ण कोरम द्वारा ही स्वीकृत किए जाते हैं, और एसआईआर का उद्देश्य केवल दोहरी प्रविष्टियों, मृत व्यक्तियों और फर्जी नामों को हटाकर मतदाता सूची को पूरी तरह त्रुटिरहित और शुद्ध बनाना है।
सड़कों पर हुए हिंसक टकरावों और गिरफ्तारियों के बीच कांग्रेस और विपक्षी गठबंधन के दिग्गजों ने मुख्य चुनाव आयुक्त और केंद्र की एनडीए सरकार पर संवैधानिक मर्यादाओं को तार-तार करने का आरोप लगाया लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए लिखा:
“संविधान के दुश्मन पूरी तरह बेनकाब हो चुके हैं। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव हमारे लोकतंत्र की आत्मा हैं, लेकिन आज चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था को सत्ता के इशारे पर चलाया जा रहा है। लोकतंत्र को बंधक बनाने वालों का सच अब देश की 140 करोड़ जनता के सामने आ चुका है। न्याय होकर रहेगा, और जनता अपने मताधिकार की रक्षा स्वयं करेगी।”
कांग्रेस के राष्ट्रीय संगठन महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने संवाददाताओं को संबोधित करते हुए कहा:
“मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार निष्पक्ष अंपायर की तरह नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के साथ मिलकर देश के लोकतांत्रिक ताने-बाने को नष्ट करने की आपराधिक साजिश (Criminal Conspiracy) में लिप्त हैं। जब चुनाव आयोग के अपने ही दो वरिष्ठ आयुक्त फाइलों पर यह लिख रहे हैं कि उनके बिना पूछे फैसले लिए जा रहे हैं, तो ज्ञानेश कुमार को एक मिनट भी अपने पद पर रहने का नैतिक अधिकार नहीं है। उन्हें तुरंत इस्तीफा देना चाहिए और उनके कृत्यों की आपराधिक जांच होनी चाहिए।”
बिहार की राजधानी पटना में भारी पुलिस बैरिकेड्स और वाटर कैनन की बौछारों के बीच छात्रों और कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कांग्रेस नेता कन्हैया कुमार ने मशहूर पंक्ति दोहराई:
“हम लोकतंत्र की रक्षा के लिए सड़कों पर उतरे हैं। यदि इस देश की सड़कें खामोश हो जाएंगी, तो संसद आवारा हो जाएगी! यह लड़ाई किसी एक पार्टी की नहीं, बल्कि इस देश के गरीब, मजदूर और आम नागरिक के उस अंतिम अधिकार की रक्षा की है जो बाबासाहेब आंबेडकर ने एक वोट के रूप में हमें दिया था।”
हिमाचल प्रदेश के उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री ने कसुम्पटी में विरोध मार्च को संबोधित करते हुए कहा कि हालिया खुलासों ने यह शीशे की तरह साफ कर दिया है कि भाजपा की बड़ी चुनावी जीतों का राज जनता का समर्थन नहीं, बल्कि निर्वाचन आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा की जा रही सुनियोजित ‘वोट चोरी’ है।
बिहार कांग्रेस के हजारों कार्यकर्ताओं ने प्रदेश कार्यालय सदाकत आश्रम से निकलकर मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय की ओर कूच किया। डाकबंगला चौराहे के समीप पुलिस ने कंटीले तारों वाले बैरिकेड्स लगाकर उन्हें रोका। जब युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने बैरिकेड्स को उखाड़ फेंका, तो पुलिस ने दंगा-रोधी वाहनों से शक्तिशाली वाटर कैनन (ठंडे पानी की बौछारें) चलाईं, जिससे कई कार्यकर्ता जमीन पर गिर पड़े और अफरा-तफरी मच गई।
पंजाब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग के नेतृत्व में सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने चंडीगढ़ स्थित चुनाव आयोग दफ्तर का घेराव किया। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ने से रोकने के लिए वाटर कैनन का सहारा लिया। पानी की बौछारों के बीच भी कार्यकर्ता सड़क पर धरने पर बैठ गए, जिसके बाद पुलिस ने राजा वड़िंग सहित कई वरिष्ठ विधायकों को जबरन पुलिस वैन में भरकर अज्ञात स्थान पर भेज दिया।
संवेदनशील राज्य मणिपुर की राजधानी इंफाल के लाम्फेल क्षेत्र में कांग्रेस विधायकों और कार्यकर्ताओं ने मुख्य निर्वाचन अधिकारी के दफ्तर के बाहर प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का पुतला जलाना शुरू किया, तो सुरक्षा बलों के साथ धक्का-मुक्की हुई। स्थिति को नियंत्रण से बाहर होता देख मणिपुर पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस के कई गोले दागे।
असम की राजधानी गुवाहाटी में लोकसभा में कांग्रेस के उप-नेता गौरव गोगोई के नेतृत्व में राजीव भवन से दिसपुर की ओर विशाल मार्च निकाला गया। सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने पुलिस द्वारा लगाए गए बैरिकेड्स को तोड़ दिया, जिसके बाद पुलिस ने बल प्रयोग करते हुए गौरव गोगोई और कई पूर्व मंत्रियों को हिरासत में ले लिया। गोगोई ने पुलिस वैन से हाथ हिलाते हुए कहा कि यह दमनकारी नीति जनता की आवाज को दबा नहीं सकती।
सड़कों पर प्रदर्शन के अलावा कांग्रेस की युवा शाखा और नागरिक अधिकार संगठनों ने इस मुद्दे को तकनीकी और विधिक मंचों पर भी पूरी आक्रामकता के साथ उठाया है भारतीय युवा कांग्रेस (IYC) ने गुरुवार को एक राष्ट्रव्यापी ऑनलाइन नागरिक अभियान और याचिका शुरू की, जिसका शीर्षक रखा गया “Gyanesh, It’s Done Bro”। इसके तहत लाखों युवाओं से चुनावी पारदर्शिता और निष्पक्षता के लिए हस्ताक्षर जुटाए जा रहे हैं। युवा कांग्रेस ने मांग की है कि ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल के दौरान मतदाता सूची में किए गए सभी बदलावों का एक स्वतंत्र श्वेत-पत्र जारी किया जाए।
कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी (KPCC) ने बेलगावी में भाजपा विधायक अभय पाटिल और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ औपचारिक पुलिस शिकायत दर्ज कराई है। आरोप है कि स्थानीय भाजपा नेताओं के इशारे पर हजारों वास्तविक मतदाताओं के नाम सूची से दुर्भावनापूर्ण तरीके से हटाए गए। मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा एसआईआर के तहत लिए गए कथित ‘एकतरफा फैसलों’ को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक विशेष जनहित याचिका (PIL) दाखिल की गई है। याचिका में शीर्ष अदालत की निगरानी में एक उच्चस्तरीय विशेष जांच दल (SIT) गठित करने और दोनों चुनाव आयुक्तों द्वारा उठाई गई 14 आपत्तियों की न्यायिक जांच कराने की मांग की गई है।
कांग्रेस और विपक्षी दलों ने स्पष्ट कर दिया है कि यह आंदोलन शुक्रवार के प्रदर्शनों के साथ समाप्त नहीं होगा, बल्कि इसे एक सुनियोजित और दीर्घकालिक अभियान के रूप में चलाया जाएगा पार्टी के निर्देशानुसार, सोमवार, 28 सितंबर 2026 को देश के सभी जिला मुख्यालयों में जिला कांग्रेस कमेटियां (DCC) संबंधित जिला कलेक्ट्रेट कार्यालयों का घेराव करेंगी और राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपेंगी।
संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत, मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल उसी रीति और उन्हीं आधारों पर पद से हटाया जा सकता है जैसे सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है (अर्थात संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत से पारित महाभियोग)। विपक्षी दलों कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, डीएमके, राजद, माकपा, आप और शिवसेना (यूबीटी) के प्रतिनिधियों ने नई दिल्ली में संयुक्त बैठक कर इस बात पर सैद्धांतिक सहमति जताई है कि आगामी संसद सत्र में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग का नोटिस पेश किया जाएगा।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने 29 सितंबर को नई दिल्ली में कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) की आपात बैठक बुलाई है, जिसमें इस मुद्दे को जनता के बीच ले जाने के लिए आगामी विधानसभा चुनावों और संसद में आक्रामक रणनीति पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कांग्रेस और विपक्षी दलों का यह राष्ट्रव्यापी उग्र प्रदर्शन केवल एक राजनीतिक बयानबाजी नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्र भारत के सबसे प्रतिष्ठित और स्वायत्त संवैधानिक संस्थानों में से एक भारत निर्वाचन आयोग की साख और विश्वसनीयता पर उठा अब तक का सबसे बड़ा संकट बन गया है।
लोकतंत्र की पूरी इमारत इस बुनियादी विश्वास पर टिकी होती है कि चुनाव निष्पक्ष होंगे और अंपायर किसी भी टीम की जर्सी नहीं पहनेगा। जब निर्वाचन आयोग के भीतर से ही दो संवैधानिक आयुक्तों द्वारा फाइलों पर लिखित आपत्तियां दर्ज कराने की बातें सार्वजनिक हो जाएं, और देश भर में लाखों मतदाताओं के नाम कटने की शिकायतें सड़कों पर जन-आंदोलन का रूप ले लें, तो यह पूरे लोकतांत्रिक ढांचे के लिए एक गंभीर खतरे की घंटी है।
वाटर कैनन की बौछारें, आंसू गैस के धुएं और नेताओं की गिरफ्तारियां इस बात का प्रमाण हैं कि आने वाले दिनों में यह सियासी आग और भड़कने वाली है। अब जिम्मेदारी न्यायपालिका, संसद और स्वयं निर्वाचन आयोग की है कि वे आगे आकर संपूर्ण प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाएं, जनता और सभी राजनीतिक दलों के संशयों का निवारण करें, और यह सुनिश्चित करें कि बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा प्रदत्त मताधिकार की पवित्रता पर किसी भी प्रकार का राजनीतिक या प्रशासनिक ग्रहण न लगने पाए।

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