
इंटरनेट और सोशल मीडिया आज न केवल संवाद, अभिव्यक्ति और जनचेतना के सबसे बड़े माध्यम बन चुके हैं बल्कि ये सत्ता, स्टेट और समाज के रिश्ते में सबसे अहम बदलाव ला रहे हैं। ऐसे माहौल में जब कर्नाटक हाईकोर्ट सरकार की सहयोग पोर्टल व्यवस्था को हरी झंडी देता है जहां अब बिना किसी न्यायिक समीक्षा के, सैकड़ों सरकारी अधिकारी सीधे सोशल मीडिया कंटेंट हटाने का अनुरोध कर सकते हैं तो यह बहस जोर पकड़ लेती है क्या यह स्वतंत्र अभिव्यक्ति की सुरक्षा है, या सुविधाजनक सेंसरशिप की सीढ़ी?
कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा कि सहयोग पोर्टल ‘सेंसरशिप’ नहीं, बल्कि एक ‘डिजिटल पोस्ट ऑफिस’ है जहां प्रशासन व पुलिस की शिकायतें सीधे प्लेटफॉर्म तक जाती हैं और अवैध, गैरकानूनी कंटेंट पर फौरन प्रतिक्रिया संभव है। अदालत का कहना था कि सरकारी एजेंसियों और इंटरनेट इंटरमीडियरी कंपनियों के बीच संवाद को इतना सिस्टमेटिक, पारदर्शी और ‘ट्रेस करने’ योग्य बनाना इस युग की जरूरत है। बात यहीं तक रहती तो शायद बहस नहीं होती, लेकिन बिना कोर्ट की देखरेख और बिना स्वतंत्र समीक्षा के अब दर्जनों अधिकारी किसी भी सोशल मीडिया पोस्ट, वीडियो या पेज पर ‘हटाओ’ का बटन दबा सकते हैं यही अधिकार खुद में कई सवाल खड़े करता है।
भारत के संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) प्रत्येक नागरिक को बोलने की आज़ादी देता है, पर वह 19(2) के तहत सीमित किया जा सकता है राज्य की सुरक्षा, कानून व्यवस्था, नैतिकता, या सार्वजनिक व्यवस्था के नाम पर। कोर्ट ने अपने फैसले में साफ किया कि अभिव्यक्ति की आज़ादी पर उचित प्रतिबंध लगाने की शक्ति हमेशा से सरकार के पास रही है। मगर दिक्कत तब है, जब इस शक्ति का इस्तेमाल एक-तरफा, बिना सुनवाई, बिना अपील की सुविधा और बिना कारण बताए सीधे-सीधे हो सके। इससे विरोधी विचार, असहज सच्चाई या सत्ता विरोधी आलोचना महज एक क्लिक में गायब हो सकती है फिर चाहे वह संविधान के दायरे में क्यों न आती हो।
श्रेया सिंघल फैसले के जरिए कोर्ट ने हमेशा ही अभिव्यक्ति की अभयारण्यता और सरकारी सेंसरशिप के बीच स्पष्ट लाइन बनाई थी ‘तकनीकी आदेश’ और कंटेंट ब्लाकिंग केवल पारदर्शी, रिकॉर्डेड, लिखित और न्यायिक समीक्षा के साथ हो। मौजूदा सहयोग पोर्टल व्यवस्था में इन थंब रूल्स की स्पष्टता कम है जिससे प्लेटफॉर्म, पत्रकार, एक्टिविस्ट और आम नागरिक डर और असमंजस में हैं कि कहीं कोई अफसर निजी या सरकार विरोधी विचार पर कार्रवाई न कर बैठे।
X जैसी सोशल कंपनियों ने खुले तौर पर चिंता जताई है कि यह व्यवस्था भारत की अभिव्यक्ति की आज़ादी की आत्मा पर हमला है। उनका तर्क है लाखों पुलिस, प्रशासनिक अधिकारी जब चाहें कोई भी पोस्ट हटवाने की मांग कर सकते हैं, क्योंकि प्रशासन के दिशा-निर्देश के विरुद्ध जाने पर जुर्माना या मुकदमा हो सकता है, इसके लिए न्यायिक जांच, अपील या स्पष्ट कारण बताने की भी जरूरत नहीं होगी। कंपनियों का मानना है कि भारत के लोकतंत्र, अदालतों और संविधान की मूल भावना को इस व्यवस्था में नजरअंदाज किया गया है।
सरकार, अदालत का तर्क है कि उग्रवाद, दुष्प्रचार, साइबर अपराध, या नफरत भरे भाषण जैसी डिजिटल चुनौतियों को रोकना इतना जरूरी है कि योजनाबद्ध, तीव्र और चुस्त प्रबंधन के लिए प्रशासन को कंटेंट हटाने की त्वरित शक्ति मिलनी चाहिए। कोर्ट ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि, “सोशल मीडिया को अराजक स्वतंत्रता की छूट नहीं दी जा सकती भारत का डिजिटल स्पेस कोई ‘फ्री फॉर ऑल’ मैदानी खेल नहीं, बल्कि राज्य के नियम-कानूनों के दायरे में रहना तय है”।
समानांतर, अब डर यही है कि प्रशासन या सत्ता जब-तब, सुविधा के अनुसार, विरोधी विचार, अल्पसंख्यक की आवाज़ या असंतोष को ‘गैरकानूनी’ कहकर इंटरनेट से गायब कर दे। आलोचना क्यों उठी? अब प्लेटफॉर्म्स को हर शिकायत पर तेज कार्रवाई करनी होगी, कहीं उनका लाइसेंस, बिजनेस खतरे में न पड़ जाए, मीडिया, एक्टिविस्ट्स और सामूहिक विरोध को हाशिए की तरफ धकेला जा सकता है, अभिव्यक्ति की व्यापकता और लोकतांत्रिक संवाद में डर और सेंसरशिप का माहौल बन सकता है।
इतिहास गवाह है कि जब-जब अभिव्यक्ति के अधिकार पर खतरे आए हैं, भारत में समाज, अदालतें और मीडिया सजग होकर लोकतांत्रिक परंपरा की रक्षा के लिए आगे आए हैं। डिजिटल युग में यह जिम्मेदारी और बढ़ जाती है क्योंकि अब सिर्फ प्रिंट-पत्र-पत्रिका नहीं, हर नागरिक खुद एक प्रकाशक, रिपोर्टर और पाठक है। फ्री स्पीच के पक्षधर कह रहे हैं कि संवाद, विवाद, आलोचना और असहमति के बिना लोकतंत्र केवल रस्मी बनकर रह जाता है।
डिजिटल स्पेस को सुरक्षित, जिम्मेदार, और समावेशी बनाना जरूरी है पर इसके लिए बिना वजह, बिना अदालत, बिना अपील के, महज अफसरशाही की मर्जी पर सेंसरशिप उचित नहीं। प्लेटफॉर्म्स को चाहिए कि मॉडरेशन में न्याय, तर्क और कानूनी प्रक्रिया सुनिश्चित करें। सरकार को चाहिए कि नागरिक अधिकारों, न्यायिक संतुलन और सोशल मीडिया के सामाजिक पक्षों का ध्यान रखे और कोर्ट को संतुलन, निगरानी और प्रतिक्रिया, तीनों के सही मिश्रण पर फैसला सुनाना चाहिए जहाँ नागरिक भी सुरक्षित रहें और सरकार भी समाज, राष्ट्र की सुरक्षा कर सके।
कर्नाटक हाईकोर्ट का सहयोग पोर्टल पर फैसला, भले ही एक प्रशासनिक सुविधा का दावा करता हो, पर असल में यह अभिव्यक्ति, प्लेटफॉर्म जिम्मेदारी और राज्य की शक्ति के बीच नए संघर्ष की शुरुआत भी है। भारत का डिजिटल भविष्य पारदर्शिता, न्याय और उत्तरदायित्व पर ही टिकेगा।
सवाल यह नहीं कि ‘क्या हटाया जाए?’ बल्कि असली चुनौती यह है कि किस प्रक्रिया और जवाबदेही के साथ, कौन तय करेगा कि क्या हटे और क्या नहीं। लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों को सुरक्षित रखते हुए, राज्य, मंच व समाज तीनों को अपनी भूमिका, सीमाएँ और जिम्मेदारियाँ बार-बार याद रखनी होंगी। क्योंकि इंटरनेट पर आज़ादी की रक्षा सिर्फ कानून या कोर्ट का दायित्व नहीं, बल्कि हर जागरूक नागरिक, सचेत मंच और सतर्क लोकतंत्र की साझा विरासत है।



