कला, अश्लीलता और कानून का टकराव: ‘सरके चुनर तेरी सरके’ गाने पर राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) का कड़ा प्रहार
24 मार्च की सुनवाई: निर्माताओं के लिए कठिन राह

18 मार्च, 2026 को भारतीय मनोरंजन जगत और डिजिटल मीडिया के गलियारों में उस समय हड़कंप मच गया, जब राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) ने हाल ही में रिलीज हुए म्यूजिक वीडियो ‘सरके चुनर तेरी सरके’ (Sarke Chunar Teri Sarke) के खिलाफ निर्णायक कानूनी कार्रवाई शुरू की। आयोग ने न केवल इस गाने की सामग्री को “यौन रूप से उत्तेजक और आपत्तिजनक” करार दिया है, बल्कि इसके निर्माताओं, निर्देशकों और संबंधित म्यूजिक लेबल को 24 मार्च, 2026 को आयोग के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का समन भी जारी किया है।
यह मामला केवल एक गाने के विरोध का नहीं है, बल्कि यह डिजिटल युग में ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ बनाम ‘सामाजिक मर्यादा और महिला गरिमा’ के बीच बढ़ती खाई का एक ज्वलंत उदाहरण है।
यह गाना मार्च 2026 की शुरुआत में एक प्रमुख यूट्यूब चैनल और विभिन्न ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म्स पर रिलीज हुआ था। रिलीज के कुछ ही घंटों के भीतर, इसके बोल (Lyrics) और फिल्मांकन (Visuals) को लेकर सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं आने लगीं। ट्विटर (अब X) और इंस्टाग्राम पर #BanSarkeChunar जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे। यूजर्स का आरोप था कि गाने में महिलाओं का अत्यधिक ‘वस्तुकरण’ (Objectification) किया गया है और इसके दृश्य भारतीय परिवारों के साथ देखने लायक नहीं हैं। विभिन्न समाचार चैनलों और डिजिटल पोर्टलों ने इस गाने की सामग्री पर विशेषज्ञों की राय प्रकाशित की, जिसमें इसे “सस्ते प्रचार के लिए अश्लीलता का सहारा” बताया गया। इन्हीं रिपोर्ट्स के आधार पर NCW ने अपनी कार्रवाई शुरू की।
राष्ट्रीय महिला आयोग ने NCW अधिनियम, 1990 के तहत प्रदत्त अपनी शक्तियों का उपयोग किया है। आयोग के पास किसी भी व्यक्ति को तलब करने, शपथ पर गवाही लेने और दस्तावेजों की मांग करने के लिए एक ‘सिविल कोर्ट’ जैसी शक्तियां होती हैं। इस धारा के तहत आयोग महिलाओं से संबंधित किसी भी मुद्दे पर, जहाँ उनके अधिकारों का हनन हो रहा हो, खुद से संज्ञान ले सकता है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि 24 मार्च की सुनवाई में निर्माताओं को उन सभी “प्रासंगिक दस्तावेजों” (Relevant Documents) के साथ आना होगा, जिनमें सेंसर सर्टिफिकेट (यदि लागू हो) और फिल्मांकन की अनुमति के कागजात शामिल हैं।
एनसीडब्ल्यू के आधिकारिक बयान (X पोस्ट) में जिन कानूनों का उल्लेख किया गया है, वे इस मामले को अत्यंत गंभीर बनाते हैं 2023 में लागू हुई इस नई संहिता के तहत सार्वजनिक रूप से अश्लीलता फैलाने और महिलाओं की लज्जा भंग करने वाली सामग्री के प्रसार पर कड़े दंड का प्रावधान है। इंटरनेट के माध्यम से यौन रूप से स्पष्ट सामग्री (Sexually Explicit Content) को प्रकाशित या प्रसारित करना आईटी एक्ट की धारा 67 के तहत अपराध है। आयोग ने इस अधिनियम का जिक्र संभवतः इसलिए किया है क्योंकि गाने के कुछ दृश्यों में या इसके चित्रण के पीछे नाबालिगों की सुरक्षा और उनके मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव का मुद्दा जुड़ा हो सकता है।
एनसीडब्ल्यू की अध्यक्ष ने इस मामले पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि संगीत और कला के नाम पर “यौन रूप से उत्तेजक” (Sexually Suggestive) सामग्री को परोसना बंद होना चाहिए। आयोग का मानना है कि ‘सरके चुनर तेरी सरके’ में जिस तरह से महिला कलाकार के वस्त्रों और शारीरिक हाव-भाव को फिल्माया गया है, वह कलात्मक सौंदर्य के दायरे से बाहर है और केवल ‘क्लिकबेट’ (Clickbait) संस्कृति को बढ़ावा देता है। ऐसी सामग्री न केवल किशोरों के मन पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है, बल्कि समाज में महिलाओं के प्रति ‘उपभोग की वस्तु’ वाली मानसिकता को भी सुदृढ़ करती है।
24 मार्च को होने वाली सुनवाई के कई संभावित परिणाम हो सकते हैं आयोग निर्माताओं को सार्वजनिक रूप से माफी मांगने और गाने के विवादित हिस्सों को हटाने या एडिट करने का निर्देश दे सकता है। यदि निर्माता अपनी गलती स्वीकार नहीं करते हैं, तो NCW सूचना और प्रसारण मंत्रालय (MIB) को इस गाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने और इसे सभी डिजिटल प्लेटफॉर्म से हटाने के लिए सिफारिश कर सकती है। आयोग पुलिस को निर्देश दे सकता है कि वे निर्माताओं के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करें।
यह विवाद म्यूजिक इंडस्ट्री के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ है। फिल्मों के लिए जहाँ ‘सेंसर बोर्ड’ (CBFC) है, वहीं स्वतंत्र म्यूजिक वीडियो के लिए वर्तमान में कोई कड़ा नियामक ढांचा (Regulatory Framework) नहीं है। ओटीटी और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म्स पर प्रतिदिन सैकड़ों गाने रिलीज होते हैं, जिनमें से कई केवल ‘अश्लीलता’ के दम पर करोड़ों व्यूज हासिल करने की कोशिश करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि म्यूजिक लेबल्स को अपनी ‘इन-हाउस’ स्क्रीनिंग कमेटी बनानी चाहिए ताकि कानूनी विवादों से बचा जा सके।
अनुच्छेद 19(1)(a) हमें बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी देता है, लेकिन अनुच्छेद 19(2) उसी आजादी पर “शालीनता और नैतिकता” (Decency and Morality) के आधार पर ‘उचित प्रतिबंध’ लगाने की शक्ति भी देता है। पूर्व में भी कई गानों (जैसे ‘हनी सिंह’ के कुछ विवादित ट्रैक) पर अदालतों और महिला आयोगों ने इसी आधार पर नकेल कसी है कि आजादी का अर्थ ‘उच्छृंखलता’ नहीं है।
‘सरके चुनर तेरी सरके’ गाना अब केवल एक विवाद नहीं, बल्कि एक मिसाल बनने जा रहा है। राष्ट्रीय महिला आयोग की यह सक्रियता संकेत देती है कि 2026 के भारत में डिजिटल सामग्री की ‘सेंसरशिप’ अब केवल सरकार के भरोसे नहीं है, बल्कि संवैधानिक संस्थाएं भी अपनी शक्तियों का पूर्ण उपयोग करने के लिए तैयार हैं।
24 मार्च को होने वाली सुनवाई न केवल इस गाने का भविष्य तय करेगी, बल्कि आगामी समय में म्यूजिक डायरेक्टर्स और राइटर्स के लिए एक ‘गाइडलाइन’ की तरह काम करेगी। क्या कलाकार अपनी रचनात्मकता को मर्यादा के भीतर रख पाएंगे? या ‘वायरल’ होने की भूख कानून की मर्यादाओं को लांघती रहेगी? इसका उत्तर आने वाले दिनों में मिलेगा।



