भारत-यूएई कूटनीति का नया क्षितिज: रणनीतिक प्रभाव और मानवीय संवेदनाओं का संगम
इस्लामाबाद से यूएई की वापसी: एक बड़ा कूटनीतिक संदेश

संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की हालिया नई दिल्ली यात्रा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी गहन चर्चा ने वैश्विक कूटनीति के पटल पर एक युगांतरकारी बदलाव का संकेत दिया है। यह यात्रा केवल दो राष्ट्रप्रमुखों की औपचारिक मुलाकात नहीं थी, बल्कि यह दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व (Middle East) के बीच बदलते शक्ति संतुलन का एक सजीव दस्तावेज है।
इस यात्रा के बाद उभरते घटनाक्रम विशेषकर पाकिस्तान के इस्लामाबाद हवाई अड्डे के प्रबंधन से यूएई का पीछे हटना और 900 भारतीय कैदियों की रिहाई यह स्पष्ट करते हैं कि भारत का रणनीतिक प्रभाव (Strategic Clout) अब उस स्तर पर पहुँच गया है जहाँ वह वैश्विक शक्तियों के निवेश और कूटनीतिक निर्णयों को प्रभावित कर रहा है।
वर्ष 2026 में भारत और यूएई के संबंध अपने उस शिखर पर हैं जिसे ‘स्वर्ण युग’ कहा जा सकता है। शेख मोहम्मद बिन जायद (MBZ) की यात्रा के दौरान जिस गर्मजोशी का प्रदर्शन किया गया, वह केवल कूटनीतिक प्रोटोकॉल नहीं, बल्कि दो देशों के बीच बढ़ते अटूट विश्वास का प्रतीक है। इस यात्रा के दूरगामी परिणाम व्यापारिक समझौतों से कहीं आगे जाकर क्षेत्रीय राजनीति के समीकरणों को पुनर्गठित कर रहे हैं।
नई दिल्ली में पीएम मोदी से मुलाकात के कुछ ही दिनों बाद यह खबर आना कि यूएई ने इस्लामाबाद हवाई अड्डे के संचालन और आधुनिकीकरण से जुड़ी चर्चाओं से खुद को अलग कर लिया है, अंतरराष्ट्रीय राजनीति के जानकारों के लिए एक बड़ा संकेत है। यूएई जैसे वैश्विक निवेशक अब उन्हीं देशों में पूंजी लगाना चाहते हैं जहाँ राजनीतिक स्थिरता और आर्थिक विकास की स्पष्ट दिशा हो। पाकिस्तान के मौजूदा आर्थिक संकट और अस्थिर माहौल ने उसे एक ‘जोखिम भरा बाजार’ बना दिया है, जबकि भारत ‘स्थिरता के द्वीप’ के रूप में उभरा है।
यूएई का यह निर्णय भारत की उस बढ़ती ताकत को दर्शाता है जहाँ वह अब अपने सहयोगियों को यह समझाने में सफल रहा है कि उनके रणनीतिक हित भारत के साथ जुड़ने में अधिक सुरक्षित हैं। यह पाकिस्तान के उस पुराने विमर्श (Narrative) को एक बड़ा झटका है जिसमें वह खाड़ी देशों के साथ केवल ‘धार्मिक आधार’ पर संबंधों की बात करता था।
इस यात्रा की सबसे भावुक और महत्वपूर्ण उपलब्धि 900 भारतीय नागरिकों की रिहाई रही। पीएम मोदी और शेख मोहम्मद बिन जायद के बीच के निजी संबंधों ने इस असंभव कार्य को संभव बनाया है। यूएई ने इन कैदियों को रिहा कर यह संदेश दिया है कि वह भारत को केवल एक ‘व्यापारिक साझीदार’ नहीं, बल्कि एक ‘करीबी मित्र’ मानता है। यूएई में रहने वाले 35 लाख से अधिक भारतीय वहां की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। इन कैदियों की रिहाई से न केवल उनके परिवारों को खुशी मिली है, बल्कि पूरे भारतीय समुदाय में यह विश्वास जगा है कि उनकी मातृभूमि उनके साथ खड़ी है।
भारत और यूएई की साझेदारी अब “क्रेता-विक्रेता” के रिश्ते से ऊपर उठकर एक “साझा भविष्य” की ओर बढ़ रही है। 2026 में दोनों देशों के बीच रक्षा संबंध केवल सैन्य अभ्यास (जैसे ‘डेजर्ट साइक्लोन’) तक सीमित नहीं हैं। अब दोनों देश रक्षा उपकरणों के सह-उत्पादन पर चर्चा कर रहे हैं। यूएई ने बार-बार भारत के इस रुख का समर्थन किया है कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता और कट्टरपंथ के खिलाफ लड़ाई में वह भारत के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है।
व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते (CEPA) के लागू होने के बाद भारत-यूएई व्यापार में अभूतपूर्व उछाल आया है। दोनों देशों का लक्ष्य 2030 तक गैर-तेल व्यापार को 100 बिलियन डॉलर तक पहुँचाना है। यूएई भारत के ‘फिनटेक’ और ‘डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे’ (जैसे UPI) को अपने यहाँ अपनाने में सबसे आगे रहा है। यूएई का सॉवरेन वेल्थ फंड (Sovereign Wealth Fund) भारत के बुनियादी ढांचे, नवीकरणीय ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा पार्कों (Food Parks) में अरबों डॉलर का निवेश कर रहा है।
यूएई भारत के लिए केवल तेल का स्रोत नहीं है। यूएई भारत के भूमिगत रणनीतिक तेल भंडारों में योगदान देने वाला पहला विदेशी देश है। यूएई भारत में अत्याधुनिक ‘फूड पार्कों’ के निर्माण में निवेश कर रहा है, जो भारतीय किसानों के लिए नए बाजार खोलेगा और खाड़ी देशों के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करेगा।
यूएई का पाकिस्तान से पीछे हटना और भारत की ओर झुकना दक्षिण एशिया की राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है। पाकिस्तान लंबे समय से खाड़ी देशों का उपयोग भारत के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर करता रहा था। लेकिन आज, भारत का तकनीकी कौशल, विशाल बाजार और वैश्विक मंचों पर बढ़ता कद यूएई जैसे देशों को यह सोचने पर मजबूर कर रहा है कि उनका भविष्य किसके साथ सुरक्षित है। पाकिस्तान का “लायबिलिटी” (Liability) बनना और भारत का “एसेट” (Asset) बनना अब एक वैश्विक सच्चाई है।
शेख मोहम्मद बिन जायद की यह यात्रा और उसके बाद के रणनीतिक निर्णय यह सिद्ध करते हैं कि 2026 का भारत अब केवल प्रतिक्रियावादी कूटनीति (Reactive Diplomacy) नहीं करता, बल्कि वह सक्रिय रूप से वैश्विक व्यवस्था को आकार दे रहा है। भारत और यूएई की यह साझेदारी “एशियाई शताब्दी” की आधारशिला है।
चाहे वह इस्लामाबाद हवाई अड्डे से यूएई का पीछे हटना हो या जेलों से भारतीयों की बड़ी रिहाई, ये सभी घटनाक्रम “नए भारत” की वैश्विक ताकत और कूटनीतिक कुशलता के जीवित प्रमाण हैं। यह साझेदारी आने वाले दशकों में वैश्विक अर्थव्यवस्था और सुरक्षा के लिए एक ‘एंकर’ (Anchor) का काम करेगी।



